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ये समाजवाद क्‍या होता है!

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question markखद्दर में लकदक। खड़े-खड़े से सफेद बाल। कंधे पर गांधीजी वाला झोला। वह आते ही तख्‍त पर बैठ गए। बिना किसी भूमिका के उनका सीधा सा सवाल था–पहचानते हो मुझे? जी, कुछ-कुछ। शायद आप लोहियाजी हैं-मेरा जवाब था। फिर सवाल-कैसे पहचाना ? कई समाजवादी नेताओं के दफ्तरों में उनकी कुर्सी के पीछे आप फ्रेम में जड़े होते हैं, देखा है मैंने।–अच्‍छा तो ये समाजवादी कौन होते हैं ? इस सवाल ने मुझे कुछ परेशान कर दिया। क्‍या बताऊं, क्‍या बताऊं–इस उधेड़बुन के बीच अगले सवाल से पीछा छुड़ाने के लिए धीरे से जवाब सरका दिया-जो समाजवाद में विश्‍वास रखते हैं। वो कुछ देर चुप हो गए। चलो सवालों से पीछा छूटा, यह सोचकर लंबी सांस छोड़ने ही जा रहा था कि उन्‍होंने सवालों की पिच पर शेन वार्न के अंदाज में एक और फिरकी डाल दी-ये समाजवाद क्‍या होता है? इस बार जवाब के बदले मैंने सवाल कर दिया, आपसे बेहतर कौन जान सकता है समाजवाद और समाजवादियों के बारे में। समाजवाद के नाम पर झंडा उठाने वाले तो रामनामी की तरह लोहियानामी ओढ़े रहते हैं। मैं कुछ गलत कह रहा हूं तो आप ही बता दीजिए। अपनी अधकटी जैकेट में हाथ डालते हुए उन्‍होंने कहा-समाजवाद के बारे में मैं इतना कह चुका हूं, लिख चुका हूं कि अब कहने के लिए कुछ शेष नहीं है। अब तुम्‍हारी बारी है, तुम्‍हारे जैसे लोगों की बारी है। वैसे तो समाजवाद के बारे में मेरा हाथ कुछ ज्‍यादा ही तंग है। लेकिन
ऐसी महान विभूति का आदेश-निर्देश कैसे टाल सकता था। अवहेलना का आरोप लगाकर अपने चेलों से शिकायत कर देंगे तो मेरी टी शर्ट तार-तार हो जएगी, इस गुणा-भाग के साथ मैंने गपोड़ी बैठकों में जो कुछ सुना था, कहना शुरू कर दिया-मैंने तो यही सुना है कि एकाधिकारवाद का उन्‍मूलन ही सच्‍चा समाजवाद है, एकाधिकार चाहे पूंजी का हो या फिर सत्‍ता-समाज के ताने-बाने में शामिल हो। समाजवाद एक पूजा है जिसमें अपने लिए कोई कामना नहीं की जाती। जिसमें बपौती कुछ भी नहीं होती। इसमें जो भी फैसले होते हैं, सामूहिक होते हैं, किसी एक के नहीं। इसकी आत्‍मा में लोकतंत्र बसता है।—लेकिन सवालों का सिलसिला मेरे जवाब से कहां थमने वाला था। फिर पूछ ही डाला उन्‍होंने-चलो फटाफट मौजूदा दौर के किसी बड़े समाजवादी का नाम बताओ। यह सवाल कुछ सरल था मेरे लिए-नेताजी हैं ना। उनसे बड़ा कौन समाजवादी होगा। आपके नाम की तो वह माला जपते हैं। आज ही तो दिन में उनके बेटे का शपथग्रहण हुआ है। मुख्‍यमंत्री बना दिया है। बड़ा ओजस्‍वी है उनका बेटा। बड़ा ख्‍याल है उन्‍हें मौजूदा
पीढ़ी का। लैपटाप-टैबलेट पीसी बांटने जा रहे है छात्रों को। बेरोजगारों को भत्‍ता देने का एलान किया है। इस बार सोच में पड़ने की बारी में उनकी थी। थोड़ी उलझन के साथ बोले ये लैपटाप क्‍या होता है। इसमें गेहूं, चावल, दलहन-तिलहन उगते हैं क्‍या, जो टैबलेट बांटेंगे, वो किस मर्ज के लिए होगी? इस सवाल पर मैं लालूजी की तरह कुछ बिहंस गया-धत्‍त, मैं भी गजबे बकलोल हूं। यह भूल ही गया कि आपके दौर में तो यह सब होते ही नहीं थे। बड़ी जादुई चीज है,  बडे़ काम की चीज है। फेसबुक पर चैट करो, ट्विट करो। वीडियो कांफ्रेंसिंग करो। अरे, आपको तो फेसबुक, ट्विटर और व‍ीडियो कांफ्रेंसिंग भी तो नहीं मालूम होगा। लेकिन भत्‍ता, लैपटाप और टैबलेट के वादे के साथ नेताजी के पुत्र ने साइकिल चलाकर आपके पुराने साथी नेहरूजी के प्रपौत्र को पीछे धकिया दिया है। और कुछ नहीं तो जेब खर्च तो बेरोजगारों का चल ही जाएगा 1000 रुपये में–अभी इस सवाल को और लंबा खींचते वो नेपथ्‍य का सफर करते हुए बोल पड़े हमारा भी क्‍या दौर था, तब रोटी, कपड़ा और मकान के वादे किए जाते थे। शायद अब यह
जरूरतें पूरी हो चुकी होंगी। तभी तो दीगर मुद्दे वजूद में आ गए। शायद तुम्‍हारे नेताजी की पार्टी में उनके बेटे से सीनियर और काबिल दूसरा कोई और नहीं होगा, तभी तो मुख्‍यमंत्री बना दिया। एक मेरी जिज्ञासा शांत करो, मोटा-मोटी कितने खर्च आएंगे, वादों को अमली जामा पहनाने में ? जवाब तो देना ही था। तोता अंदाज में रट दिया-खबर पढ़ी थी, यहीं कोई4400 करोड़ रुपये प्रति वर्ष खर्च होंगे। रही बात सीनियर और काबिल होने की तो बाकियों में वो बात कहां। वैसे तो उनके भाई-भतीजे व कुछ और लोग भी हैं, लेकिन पहला हक नेताजी के बाद उनके बेटे का ही तो बनता है। क्‍योंकि उनसे ज्‍यादा साइकिल किसी और ने थोड़े ही चलाई है। एक और सवालों का जवाब दे दो मैं चला जाऊंगा, फिर फुर्सत मिलेगी तो आकर पूछूंगा–हां,
तो  इतनी भारी-भरकम रकम कहां से लाएंगे, कुबेर का ऐसा कोई खजाना हाथ लग गया है जो खत्‍म ही नहीं होने वाला। तुम्‍हारे नेताजी और कांग्रेसियों में फिर क्‍या फर्क रह गया।-मैं कुछ उकता कर बोल बैठा–उनको किसी खजाने की क्‍या जरूरत है। हम हैं न, जनता की जेब कुबेर के खजाने से क्‍या कम है। कभी बिजली, कभी पानी, कभी चुंगी के नाम पर आहिस्‍ता आहिस्‍ता हमारी रकम खिसकाते रहेंगे। अच्‍छा, येयेये—उनकी भूमिका आगे बढ़ती इससे पहले ही मैंने हाथ जोड़ दिया, कल आम बजट है। अखबार में नौकर हूं, जल्‍दी दफ्तर जाना है। फिर किसी दिन बैठेंगे। शायद सवालों से मेरी उकताहट को भांप कर वह खादी वाला झोला कंधे पर
संभालने लगे–अच्‍छा चलता हूं। मुझे भी बहुत काम करने हैं। युग बदल गया है। बदले युग के साथ समाजवाद की परिभाषा तो बदलनी होगी। रोटी, कपड़ा और मकान को समाजवाद से हटाना होगा, परिवारवाद की स्‍वीकार्यता को शामिल करना होगा। मैं जहां रहता हूं, वहां आचार्य नरेंद्र देव, मधु लिमये और जनेश्‍वर जैसे समाजवादी भी रहते हैं। उनको बताना होगा कि सियासत में हमने अपना कोई वारिस न लाकर कितनी बड़ी गलती की है। हां, जब भी आऊंगा, सवाल तो करुंगा ही करुंगा। इसलिए जवाब के लिए तुम खुद को तैयार रखना। इसी के साथ नींद खुल गई। आपने क्‍या सोचा? यही न कि मगज में कोई केमिकल लोचा हो गया है, ठीक उसी तरह जैसे लगे रहो मुन्‍ना भाई में संजय दत्‍त को बापू नजर आने लगे थे। सही में, मैं सपना देख रहा था जनाब। लेकिन तय कर लिया है, अब अगर वो सपने में आए तो कह दूंगा, माफ कीजिए। ये समाजवाद बड़ी टेढी खीर है। मुझ जैसे आम आदमी के बस की बात नहीं है।



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4346 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Mildred के द्वारा
July 12, 2016

So eligibility activism is now considered as a &q&;oothreatuqutt; about the usurper. If push comes to shove, Rudy can sue the SS agents, and any other government goon, in a section 1983 lawsuit.But then, any number of citizens could do a class-action section 1983 lawsuit against any government crook.

aaa के द्वारा
March 18, 2015

Nice article

    sushil के द्वारा
    March 18, 2015

    good

    Audel के द्वारा
    July 12, 2016

    If I coemmnicatud I could thank you enough for this, I’d be lying.

Sushma Gupta के द्वारा
December 8, 2012

मदन मोहन जी,आपको बेस्ट व्लोगर के चयन में प्रथम रहने के लिए बहुत -बहुत वधाई…आपतो नींद में ही समाजबाद के सुन्दर सपने देख लेते है,और फिर इतने विचारणीय आलेख का निंद्रा-उपरान्त उदघाटन भी…साभार…

    Tyanne के द्वारा
    July 12, 2016

    – do18#&2n7;t think about it just build it. Also think your bandsaw should sit this one out and use your hand tools, after all isn’t this blog mostly about hand tools?

dineshaastik के द्वारा
March 31, 2012

ये समाजवाद क्या होता है, सचमुच ही बहुत ही उत्तम आलेख है। संपादकीय सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर से पुरस्कृत होने पर आदरणीय मदन मोहन जी को बधाई…..

RAMESH CHANDRA के द्वारा
March 29, 2012

समाजवाद की बहुत अच्छी व्याख्या की गयी है. समाजवाद के नाम पर देश में पूँजी वाद एवं परिवाद को थोपा जा रहा है. अमीरों एवं गरीबों के बीच की दूरी बहुत बढ़ गयी है. देश में करीब ७० प्रतिशत लोगों की न्यूनतम जरूरत पूरी नहीं हो पा रहीं है. सरकार की पहली प्राथमिकता इन लोगों के लिए कम करने की है.

    Aundre के द्वारा
    July 12, 2016

    Jag har haft samma funderingar kring pevrkljeisisten som ofta brukar ligga lite som dekoration på en köttbit. År den bara dekoration eller en del av rättens komposition? Jag brukar oftast försöka peta i mig de de mest lättangripna delarna tillsammans med resten av maten lite diskret, men det kanske är fel enligt etiketten?

charchit chittransh के द्वारा
March 28, 2012

महानुभाव; राजनैतिक समाजवाद पर इससे उत्कृष्ट व्यंग कम से कम मैंने तो नहीं ही पढ़ा ! साधुवाद !!!!!!!!!!!!!!!!!

mahesh sharma के द्वारा
March 28, 2012

दादा, आपके सर्वश्रेष्ठ ब्लागर बनने से सीना चौड़ा हो गया। आपको ह्रदय से कोटिशः बधाई…. ईश्वर करे आप  भविष्य में सफलता के नए प्रतिमान कायम करें।

    Buck के द्वारा
    July 12, 2016

    This has made my day. I wish all potnsigs were this good.

anupammishra के द्वारा
March 27, 2012

समाजवाद पर साधुवाद…

Surendra Patel के द्वारा
March 27, 2012

आपको नहीं लगता कि आप जय-जयकार कुछ ज्यादा ही करते हैं। मिठास की अनावश्यक खुश…बू आती है।

कबीर के द्वारा
March 27, 2012

इस ब्लाग को पुरस्कृत करने के पीछे निर्णायक मंडल की कुंठा व सोच की छाप काफी साफ नजर आ रही है। एक ब्लागर की सोच तक तो यह छम्य है, परंतु जब आप जागरण के बैनर तले बैठकर, एक संस्था के तौर पर उसे पुरस्कृत करते हैं तो आपकी जिम्मेदारी अधिक हो जाती है। अधिक गंभीर आसनो पर पहुंचने के बाद व्यक्ति को और अधिक धैर्य व शुचिता से काम लेना पड़ता है। पत्रकारिता को राजनैतिक मिशन के तौर पर उपयोग करना कुंठा का प्रतीक है। यह ठीक है कि पत्रकारिता उद्देश्य प्रधान भी हो सकती है। परंतु इसका उद्देश्य किसी राजनैतिक दल के लिये एजेंट के तौर पर काम करना तो हरगिज नहीं हो सकता। खासतौर पर तब तो हरगिज नहीं जब यह राजनैतिक एजेंडा जातीवाद की मानसिकता से ग्रसित हो।

Harish Bhatt के द्वारा
March 26, 2012

आदरणीय मदन जी सादर प्रणाम. कांटेस्ट जीतने पर हार्दिक बधाई.

Munish Dixit के द्वारा
March 26, 2012

आपके ब्लाग को प्रतियोगिता में चुने जाने पर बधाई

madan mohan singh,jagran के द्वारा
March 26, 2012

सबको आभार। मैं भी लिखूं। आप भी लिखें। यह सिलसिला अनवरत चलता रहे। जागरण जंक्‍शन का परचम लहराता रहे। एक  पत्रकार के लिए अनवरत और बेलाग-बेबाक लिखते रहना ही सच्‍चा समाजवाद है। जय समाजवाद। जय जागरण जंक्‍शन।

satya sheel agrawal के द्वारा
March 26, 2012

मदन मोहन जी, कांटेस्ट विजेता होने पर बहुत बहुत बधाई

yamunapathak के द्वारा
March 23, 2012

aapkee vyangaatmak shaily achhee lagee

vivek1959 के द्वारा
March 22, 2012

आपके ब्लाग को प्रतियोगिता में चुने जाने पर पुनः बधाई

kranti के द्वारा
March 22, 2012

इस समाजवाद के क्‍या कहने। आज की समाजवादी विचारधारा को इस तरह सहज शब्‍दों में हम सभी तक पहुंचाने के लिए आपको धन्‍यवाद। जब पढ़ेगा तभी तो बढ़ेगा इंडिया। भाई वाह

    madan mohan singh,jagran के द्वारा
    March 26, 2012

    आप पढ़े तभी तो मैं विजेता बना। सही कहा आपने

atul pandey के द्वारा
March 21, 2012

सर आपने बहुत अच्‍छा विश्‍लेषण किया है। लोहिया का समाजवाद विकृत करने में लोहिया के वारिसों का ही हाथ है। आपका लेख पढ़कर अदम जी का एक शेर याद आ रहा है।- काजू भुनी प्‍लेट में व्हिस्‍की गिलास में, उतरा है रामराज विधायक निवास में। यही है आज का समाजवाद। एक अच्‍छे लेख के लिए आपको ढेर सारी बधाई।

vaibhava pandey के द्वारा
March 21, 2012

लोहिया जी के बाद मुलायम सिंह यादव ने समाजवाद का झंडा थामा। अब उनके उत्‍तराधिकारी के रूप में अखिलेश यादव समाजवाद का परचम लहरा रहे हैं। जारी रहेगा युगों युगों तक ये समाजवाद। जय हो।

krishnakant के द्वारा
March 21, 2012

ये समाजवाद बड़ी टेढी खीर है। मुझ जैसे आम आदमी के बस की बात नहीं है।….युग बदल गया है। बदले युग के साथ समाजवाद की परिभाषा तो बदलनी होगी। रोटी, कपड़ा और मकान को समाजवाद से हटाना होगा, परिवारवाद की स्‍वीकार्यता को शामिल करना होगा। मैं जहां रहता हूं, वहां आचार्य नरेंद्र देव, मधु लिमये और जनेश्‍वर जैसे समाजवादी भी रहते हैं। उनको बताना होगा कि सियासत में हमने अपना कोई वारिस न लाकर कितनी बड़ी गलती की है। हां, जब भी आऊंगा, सवाल तो करुंगा ही करुंगा। इसलिए जवाब के लिए तुम खुद को तैयार रखना। यह विडंबना ही है कि हम सभी एक विकृत समाजवाद को ढो रहे हैं। बहुत उम्‍दा लेख है। अच्‍छे विश्‍लेषण के साथ। बहुत बहुत बधाई।

dineshaastik के द्वारा
March 21, 2012

क्या यही है समाजवाद, नहीं..नहीं..यह तो है परिवारवाद। जिस तरह लोकतंत्र में, अमीर करते हैं नियम पर शासन, और नियम करते हैं गरीबों पर, उसी तरह समाजवाद पर, परिवारवाद करता है शासन, और परिवारवाद पर होता है, गुण्डातंत्र हावी, बदल गये समाजवादी, समाजवाद के मायने, उसकी परिभाषायें, समाजवाद बन गया केवल, जनता को बेवकूफ बनाने का नारा। समाजवाद का नारा लगाओ, समाज चाहे सम्बृद्ध हो  न हो, परिवार को सम्बृद्ध बनाओ, 

    madan mohan singh,jagran के द्वारा
    March 21, 2012

    आपकी कविता को मेरी बेलौस दाद– बदल गये समाजवादी, समाजवाद के मायने, उसकी परिभाषायें, समाजवाद बन गया केवल, जनता को बेवकूफ बनाने का नारा—-

    Kamren के द्वारा
    July 12, 2016

    !!! Is that really your shoe collection!? My jaw just dropped to the floor and my eyes are turning green! So envious, but of course you deserve it girl! Love it dvlpIng!KeeritFvncy,M.E.

suryadeo singh jharia के द्वारा
March 20, 2012

सची बात लिखे है आप

    madan mohan singh,jagran के द्वारा
    March 21, 2012

    जहां तक संभव हो सच लिखना चाहिए। कोशिश आगे भी जारी रहेगी।

    Lesa के द्वारा
    July 12, 2016

    Wow that was odd. I just wrote an incredibly long comment but after I clicked submit my comment di8;7#d21&nt show up. Grrrr… well I’m not writing all that over again. Anyhow, just wanted to say wonderful blog!

amrish pandey के द्वारा
March 20, 2012

सलाम सलाम सलाम लेखक को सलाम चिंतन को मजबूर किया मंथन को मजबूर किया,, दुविधा को दूर किया

    madan mohan singh,jagran के द्वारा
    March 21, 2012

    जो चिंतन-मंथन करते हैं, उसे जागरण जंक्‍शन पर आप भी शेयर कीजिए। आपको भी सलाम।

    Karess के द्वारा
    July 12, 2016

    What lirbnatieg knowledge. Give me liberty or give me death.

srismita के द्वारा
March 20, 2012

ब्‍लाग लिखने में आपका जवाब नहीं

    madan mohan singh,jagran के द्वारा
    March 21, 2012

    कमेंट लिखने में आपका भी जवाब नहीं है।

shashank के द्वारा
March 20, 2012

ये पढ़कर बस यही कहूँगा की… भ्रस्ताचार मिटाने को .. परिवारवाद मिटने को… उठो जवानो तुमे जगाने … ये लेखनी जागरण में आई है

    madan mohan singh,jagran के द्वारा
    March 21, 2012

    जागरण जंक्‍शन को वक्‍त देने और मेरे ब्‍लॉग तक आने के लिए धन्‍यवाद।

    Robinson के द्वारा
    July 12, 2016

    He was my icon! The sad thing is that there aren’t too many icons leon;#8230;Madfnta…..Prince&#8230&…who else? Our children unfortunately do not have an icon for their generation. Who will our children cry over when they pass? Lil’ Wayne?

amritesh ambedkar के द्वारा
March 20, 2012

रोटी, कपड़ा और मकान को समाजवाद से हटाना होगा, परिवारवाद की स्‍वीकार्यता को शामिल करना होगा। ये नया स्टाइल अच्छा लगा

    madan mohan singh,jagran के द्वारा
    March 21, 2012

    नए स्‍टाइल का दौर है। इसलिए लेखन में भी नया  स्‍टाइल जरूरी है।

    Janelle के द्वारा
    July 12, 2016

    Now I feel stdupi. That’s cleared it up for me

    Rileigh के द्वारा
    July 12, 2016

    Yeah just ask anyone from Camden and th#&ey8217;ll tell you how posh they are lol. You are right in saying that it is not low income but Camden people are try hards they are hardly posh. They should get over themselves because they pretty much live in Campbelltown.

ram krishna mishra के द्वारा
March 20, 2012

आज समाजवाद परिवारवाद का पर्याय बन चूका है.. गुंडागर्दी का सारथि है समाजवाद

    madan mohan singh,jagran के द्वारा
    March 21, 2012

    हर तरह के लोग हर तरफ हैं। इसलिए किसको भला कहें और किसे बुरा। सबकी जय-जय।

pravindev के द्वारा
March 20, 2012

दले युग के साथ समाजवाद की परिभाषा तो बदलनी होगी। रोटी, कपड़ा और मकान को समाजवाद से हटाना होगा, विचार अच्‍छा लगा।

    madan mohan singh,jagran के द्वारा
    March 21, 2012

    आता वक्‍त तो बदलाव लाता ही है। और उस बदलाव को न चाहते हुए भी स्‍वीकार करना पड़ता है। लिहाजा हंस के ही स्‍वीकार कर लेना ही बेहतर।

    Christy के द्वारा
    July 12, 2016

    I see, I suopspe that would have to be the case.

bhola pandey के द्वारा
March 20, 2012

क्या लिखा है… दिल खुश हो जाता है पढ़ के,,, इस समाजवाद क कच्चे चिट्ठे ने मन को झकझोर दिया.

    madan mohan singh,jagran के द्वारा
    March 21, 2012

    पढते रहना चाहिए। आपका दिल खुश हुआ, इससे बड़ी खुशी और क्‍या होनी चाहिए।

pyaare laal chaubey के द्वारा
March 20, 2012

बहुत उम्दा लिखा है आपने,,,,पढ़ कर मन कायल हो जाता है…”

    madan mohan singh,jagran के द्वारा
    March 21, 2012

    जागरण जंक्‍शन पर इस ब्‍लॉग को पढने के लिए आपने जो वक्‍त निकाला उसके लिए शुक्रिया।

DINESH SINGH के द्वारा
March 20, 2012

समाजवाद के वर्तमान स्थिति का एकदम सटीक वर्णन किया है आपने मदन भाई,,,,, पढ़ कर दिल ओ दिमाग सोचने पे मजबूर हो जाता है की भविष्य की राजनीती क्या देश में बेहतर स्थिति लाएगी या बदतर…..मुझे मनोचिन्तन क लिए उसकने के लिए साभार स्वीकार करे…

    madan mohan singh,jagran के द्वारा
    March 21, 2012

    यह बहस के साथ चिंता का भी विषय है। आने वाले दौर में सियासत की तस्‍वीर कुछ अच्‍छी नहीं झलकती।

prabhat ranjan yadav के द्वारा
March 20, 2012

इसे कहते है पोस्ट मार्टम….खबरिया अंदाज़ में….

    madan mohan singh,jagran के द्वारा
    March 21, 2012

    ण्‍क खबरची यह नहीं करेगा तो और क्‍या करेगा बंधु।

    Keydrick के द्वारा
    July 12, 2016

    You may have not intended to do so, but I assume you might have managed to express the state of mind that a lot of folks are in. The sense of wanting to aid, but not knowing how or where, is soetnhimg a lot of us are going through.

abhishek singh के द्वारा
March 20, 2012

लोहिया, जयप्रकाश,चंद्रशेखर , जनेश्वर, के परिवार का कोई राजनीती में नहीं आया ,,लेकिन मुलायम के परिवार कोई राजनीती में आने से नहीं बचा,,इसे कहते है समाजवादी बदलावी

    madan mohan singh,jagran के द्वारा
    March 21, 2012

    अभिषेक सिंह जी, आपने जितने नाम गिनाए, उनमें एक आपके पैमाने पर फिट नहीं बैठता। चंद्रशेखरजी के पुत्र राजनीति में हैं। बलिया से हमारे सांसद हैं। लेकिन इतना फर्क जरूर है कि चंद्रशेखरजी ने अपने जीते जी उन्‍हें सियासत में कदम नहीं रखने दिया।

    Hallie के द्वारा
    July 12, 2016

    Why does this have to be the ONLY rellbaie source? Oh well, gj!

gonhia singh के द्वारा
March 20, 2012

samaajwad aaj paisa kamane ka yantra ban gya hoga.. lohia k chele ab unke guru ban baithe hai…

    madan mohan singh,jagran के द्वारा
    March 21, 2012

    चेला आगे चलकर कभी न कभी गुरु बनता ही है। बुराई इसमें नहीं है। बुराई इस बात में है कि जिसकी राह चलकर हम चेला से गुरु का स्‍थान ग्रहण कर रहे हैं, उस राह को तो न भूलें।

    Trisha के द्वारा
    July 12, 2016

    Woah nelly, how about them apeslp!

santosh kumar के द्वारा
March 20, 2012

बहुत शानदार मदन जी ,.हार्दिक साधुवाद समाज परिवार से बनता है ,.तो ये नीचे जा रहे हैं ,..समाज से परिवार तक पहुंचे हैं ,..आगे देखिये कितना नीचे जाते हैं ,..साभार

    madan mohan singh,jagran के द्वारा
    March 21, 2012

    इसके पीछे एक दलील यह भी हो सकती है कि परिवार अगर उन्‍नत कर जाएगा तो समाज के उन्‍नति में किसी न किसी तरह योगदान हो ही जाएगा।

Amit Shukla के द्वारा
March 20, 2012

awesome…समाजवाद को इतने रोचक और सहज तरीके से समझाने के लिए धन्‍यवाद। मजा आ गया, भैया।

    madan mohan singh,jagran के द्वारा
    March 21, 2012

    अमित शुक्‍ल जी इसे कहते हैं समाजवाद में परिवारवाद का तड़का। ये दौर से स्‍पाइसी फूड का इसलिए लेखन में भी तड़का जरूर है। वर्ना इस भागमभाग के दौर में दो-चार लाइन से ज्‍यादा पढ़ने की फुर्सत कम लोगों को ही है।

atul chaturvedi के द्वारा
March 20, 2012

समाजवाद के दो युगों की तुलना काबिलेगौर है।

    madan mohan singh,jagran के द्वारा
    March 21, 2012

    शोध का एक मौजू विषय है अतुल बाबू। किसी दिन कोई समाजशास्‍त्री इस विषय पर भी पीएचडी करेगा या कर रहा होगा। नतीजा राह दिखाने वाले होगा।

shulbha singh के द्वारा
March 20, 2012

pariwarwadi soch se grast hai samajwadi neta,,, lohia outdated hai…aaj akhilesh in hai

RAJ SINGH के द्वारा
March 20, 2012

SAMAJWAAD KA NAKAAB UTAR DIYA AAPNE

    madan mohan singh,jagran के द्वारा
    March 20, 2012

    भई, बेनकाब तो पहले से था, लेकिन उससे भी दो कदम आगे बढ़ गया।

    Missy के द्वारा
    July 12, 2016

    Hej ChÃ…itsne,Ãir¥Ã¥rh, hvor er du sød! Tusind tak. Jeg ved slet ikke hvad jeg skal sige eller hvor jeg skal starte. Jeg er glad for at du støtter mig og giver mig lov til at inspirere dig. At kunne inspirere andre, er alt for vildt. Det er det, som holder mig kørende. Endnu engang – tusind tak. xx Pankalla

neeraj vashitha के द्वारा
March 20, 2012

आपकी दृष्टि साफ है, आपको साधुवाद। समाजवाद स्‍वयं में एक भ्रम है या यूं कहे भ्रम फैलाया गया इसके नाम पर इसके तथाकथित नेताओ ने। इसके फोलोअरों ने। समाजावाद पूंजी से भरे देश में आ सकता है, भिखारी देशों में यह उपयुक्‍त नहीं है। इसलिए भारत में यह थ्‍यौरी फेल हो गई। आप ध्‍यान से देखें तो पता चलेगा कि जो लोग समाजवाद की बात कर रहे हैं या करते हैं, क्‍या वो इसको पूरी तरह से समझते हैं।

    madan mohan singh,jagran के द्वारा
    March 20, 2012

    साधुवाद तुम्‍हें भी नीरज। मैं जानता हूं, समाजवाद के बारे में मुझसे ज्‍यादा समझ तुम्‍हें है। मैं तो पहले ही कह चुका हूं कि समाजवाद के बारे में अपना हाथ कुछ ज्‍यादा ही तंग है।

    Wilhelmina के द्वारा
    July 12, 2016

    Your post has moved the debate fodwarr. Thanks for sharing!

देवेंद्र देवा, पीलीभीत के द्वारा
March 20, 2012

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में समाजवाद की हकीकत को आपने बेहद शानदार ढंग से बयां किया है…बहुत बहुत बधाई

    madan mohan singh,jagran के द्वारा
    March 20, 2012

    देवा, कुछ मैंने समझाया, कुछ तुम समझाते। समाजवाद का कारवां आगे बढ़ता।

ravindra ojha के द्वारा
March 20, 2012

its wonderful postmortem in disguise of the psuedo socialists reigning up. being lohiaite.netaji and others are expected to shun family rule instead they are propagating dynastic protege to helm of power.

    madan mohan singh,jagran के द्वारा
    March 20, 2012

    @रविंद्र ओझा–बाबा एक आप ही सच्‍चे समाजवादी बचे हैं उत्‍तर प्रदेश में। समाजवाद आपकी ओर बहुत भरोसे से देख रहा है।

kishor jha के द्वारा
March 19, 2012

जोरदार है। केमिकल लोचा होने से ही इस तरह का विचारोत्तेजक व्यंग्य बन सकता है। ऐसी शानदार रचना के लिए बधाई।

manish tiwari के द्वारा
March 19, 2012

वाकई हर तरह के वादों का अर्थ ही बदल गया है। समाजवाद भी उनमें से एक है। आपने समाजवाद के अर्थ को याद करते हुए बहुत अच्छी तरह भटकाव का जिक्र किया है। मनीष

    madan mohan singh,jagran के द्वारा
    March 20, 2012

    मनीष जी, ठेठ गंवई अंदाज में कहेंगे तो कुछ ऐसे होगा–समाजवाद की भइंसिया गई पानी में।

    Forever के द्वारा
    July 12, 2016

    Then they look at me all puzzled and ask, “aren’t you gonna blog about this?”, like they’re a bit hurt. Hatuah!Qaihe amusing, yet, not very surprising. Those friends probably take pleasure in “re-living” the meal be reading it on your blog. I re-live past meals and wines by reading my own.Best,N

devendra के द्वारा
March 19, 2012

वाकई में केमिकल लोचा है यह समाजवाद, तभी तो तमाम युवा बौराए खिंचे चले जाते हैं।रही बात उधारीकरण के इस नए दौर की, तो अब रोटी, कपड़ा, मकान जैसी बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने से नहीं,  बल्कि बेहिसाब ज़रूरतें पैदा करने करने से बात बनती है। टेढ़ी खीर या खैर ली से बचकर यही कहा जा सकता है कि लिखा गजबै है भाई।

    madan mohan singh,jagran के द्वारा
    March 20, 2012

    समाजवाद मगज में केमिकल लोचा की ही देन होता है। इस लोचे को झेलना सबके बस की बात नहीं। जो झेल जाता है, लोहिया बन जाता है।

krishnakant के द्वारा
March 18, 2012

ये समाजवाद बड़ी टेढी खीर है। मुझ जैसे आम आदमी के बस की बात नहीं है। उत्‍तम लेख। समाजवादी विचारधारा का मखौल उड़ाने वाले कथित समाजवाद की अच्‍छी खबर ली आपने। बधाई।

    madan mohan singh,jagran के द्वारा
    March 20, 2012

    dear KK–टेढ़ी खीर है समाजवाद, तभी तो हरेक की जेहन में नहीं उतर पाता।

ramesh mishra के द्वारा
March 18, 2012

सवालों का समाजवाद, वादों का समाजवाद, बकलोलों का समाजवाद, वाह….. समाजवाद की क्‍या तस्‍वीर खींची है मदन भाई आपने। कसम से मजा आ गया। अदरक वाली गरम चाय की चुस्‍की सा समाजवाद का ये लेख। उत्‍तम। मेरी बधाई स्‍वीकार करें।

    madan mohan singh,jagran के द्वारा
    March 20, 2012

    रमेशजी, सारे वाद के बीच एक वाद और है–मदनमोहनवाद। शुक्रिया।

vaibhava pandey के द्वारा
March 18, 2012

बहुत अच्‍छा…. असली समाजवाद क्‍या है …यह जानने को मिला…

    madan mohan singh,jagran के द्वारा
    March 20, 2012

    समाजवाद धीरे-धीरे आई बबुआ।

    Sherry के द्वारा
    July 12, 2016

    Can I just say what a relief to search out anyone who really knows exactly what they are disssucing on the internet. You actually recognize how to take a major issue to light and allow it to important. Even more people require to read this particular and know it side of the story. I cant believe you are not very popular because you obviously have the gift.

Abhishek pandey के द्वारा
March 18, 2012

उत्‍तम व्‍यंग………

    madan mohan singh,jagran के द्वारा
    March 20, 2012

    @abishek pandey– कुछ शब्‍द और खर्च देते तो अच्‍छा होता। इतनी कंजूसी अ‍च्‍छी नहीं।

राजू मिश्र के द्वारा
March 18, 2012

… डॉ. राममनोहर लोहिया से लेकर प्रोफेसर विनय कुमार तक ही समाजवाद चला, उसके बाद तो समाजवाद को लपोकियों ने हाईजैक करके सत्‍ता की सवारी का तगड़ा हथियार मान लिया। आपकी जानकारी में किसी खाटी समाजवादी नेता के कुनबे का कोई सदस्‍य राजनीति में दिखा हो तो बताइए… दरअसल में यूपी में समाजवाद नहीं पारिवारिक समाजवाद आया है। सपने में डॉ. लोहिया से मुलाकात के बहाने बढि़या तंज कसे हैं टाइगर बाबू। बधाई एण्‍ड जय हो।

    madan mohan singh,jagran के द्वारा
    March 20, 2012

    दद्दू, अब परिवारवाद का नया नामकरण हुआ है-समाजवाद।

mrigank pandey के द्वारा
March 17, 2012

सपा के वादावाद के समाजवाद पर उत्‍तम व्‍यंग। सुंदर आलेख। मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं मदन जी। साभार,

    madan mohan singh,jagran के द्वारा
    March 20, 2012

    मृगांक जी, यह व्‍यंग नहीं दर्द है। जिसके जिले में जेपी, चंद्रशेखर और जनेश्‍वर रहे हों, उनको तो समाजवाद  के जाने की असल पीड़ा रहेगी ही।

नवीन भोजपुरिया के द्वारा
March 17, 2012

समाजवाद , भारत मे समाजवाद , का ह समाजवाद , समाजवाद खाति लोहिया जी भा उनुका संगे के लोग का का कईल आ आजु के घरी मे समाजवाद के जवन चेहरा लउकत बा तवन । माने एह के ” मदन भाई पत्रकार ” ना कहि के ” मदन भाई पी एच डी” कहि दिहल जाउ त कम ना कहाई । हम जानत बानी आ राउर स्टेट्स ( फेसबुक प ) कई हाली पढे के मिलेला एह से बुझात बा की ” समाजवाद ” के कगरी से रउवा देखले बानी आ काहे ना , जेकर घर जनेसर मिसिर आ जयप्रकाश नारायण के जरी होखे ओकरा त कम से कम समाजवाद का नीमन से मालुम होखबे करी । भईया सांच के आंच ना , सांचो समाजवाद जवन एह घरी लउकत बा उ समाजवाद ना उ तानाशाही , परिवारवाद , अवसरवाद बा आ एह समाजवाद के आत्मा तानाशाही गुन ह अउरी कुछ ना । लोग पढो आ एह बात के बुझो अब एह ले नीमन तरिका से धुरकुस उडत समाजवाद के केहु ना देखा सकेला । बाकि त कहे वाला कुछउ कहत रहो ।

    madan mohan singh,jagran के द्वारा
    March 20, 2012

    बबुआ नवीन, जनेसर बाबा के देखत-देखत हमनी के लइका से जवान भइल बानी जा। हमरे गांव पूजन भइया के घरे उनकर फफुआउर रहे। उनका ले बड़ समाजवादी के कोई कि उनकर गांव के झोपड़ी अटारी न बनि पावल।

    Starly के द्वारा
    July 12, 2016

    I want to send you an award for most helpful inenertt writer.

Raghuvir Chauhan के द्वारा
March 17, 2012

बड़े भइया, आपके सपने में बड़ा है। परिवारवाद के विरोध में ही राजशाही का पतन और लोकतंत्र का उदय हुआ था, लेकिन लोकतंत्र में भी राजशाही ही शुरू हो गयी।

    madan mohan singh,jagran के द्वारा
    March 20, 2012

    रघुवीर, सपने में दम नहीं होगा तो इंसान में दम नहीं होगा। सपने में हमने हिम्‍मत दिलाते हैं।

mahesh sharma के द्वारा
March 17, 2012

क्या लाजवाब सपना देखा दादा। लोहिया जी आ गए। लोहिया जी तो अखिलेश को जानते होंगे। जनेश्वर जी ने  जाकर बताया होगा, क्योंकि जिंदगी भर परिवारवाद के खिलाफ लड़ते रहे मिनी लोहिया अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में अखिलेश की साइकिल यात्रा को हरी झंडी दिखा कर ही विदा हुए थे। बेहद सधी हुई सटीक रचना। बधाई…

    madan mohan singh,jagran के द्वारा
    March 20, 2012

    महेश जी, कहते है‍ कि छोटे लोहिया ने ही अखिलेश को युवा संगठनों की कमान संभालने की नसीहत दी थी।

avijeet के द्वारा
March 17, 2012

राजा भैया और बाकी साधु नेता बच्चों को लैपटॉप चलाना सिखाएंगे और फिर देखिए कैसे पुत्तर प्रदेश के नौजवान अमरीका वालों को भी पीछे छोड़ देंगे इस पांच साल में… बाकी जो गरीब हैं वो लैपटॉप और टैबलेट पर रोटी की फोटो डाउनलोड करके देखेंगे…

    madan mohan singh,jagran के द्वारा
    March 20, 2012

    अभिजीत, बिजली और जेब में पैसे होंगे तभी तो लैपटाप पर इंटरनेट चलेगा। वर्ना सीडी प्‍लेयर बनकर रह जाएंगे लैपटाप और टेबलेट पीसी

    Tasmine के द्वारा
    July 12, 2016

    &lasbo;&nuqp;Passou, vous trouvez normal qu’un aristocrate soit nommé à la villa Médicis, successeur de Monsieur le Neveu ? »NON, PAS POSSIBLE ! KunstStoff Thierry Kron sur toileTraube à la Villa Médicis. Notez, c’était ça ou la chaire de géopolitique à l’IEP.

Jamuna के द्वारा
March 17, 2012

सुन्दर, सार्थक और सटीक रचना

    madan mohan singh,jagran के द्वारा
    March 20, 2012

    जमुना जी, जागरण जंक्‍शन को वक्‍त देने के लिए शुक्रिया।

SHASHANK SHEKHAR SINGH के द्वारा
March 17, 2012

bahut badhiya avivyakti……maujooda samajwadi rajneeti par bahut tagda vyang..

    madan mohan singh,jagran के द्वारा
    March 20, 2012

    शशांक, अब राजनीति से समाजवाद ने विदा ले ली है। सिर्फ परिवारवाद रह गया है।


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