सर-ए-राह

जैसा देखा-सुना

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madan mohan singh,jagran


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ये पिंकी कौन है, जो पैसे वालों की है

Posted On: 27 Aug, 2013  
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Celebrity Writer Entertainment Infotainment Others में

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सुपरसोनिक साई नमो

Posted On: 25 Jul, 2013  
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Celebrity Writer Contest Entertainment Infotainment में

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अनुशासन को ठेंगा दिखाइए, प्रमोशन पाइए

Posted On: 20 Mar, 2012  
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Catch Me If You Can

Posted On: 20 Mar, 2012  
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कितना सच कितना झूठ

Posted On: 18 Mar, 2012  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Onur Kaya / 03 Ocak 2011Bora içten dileklerin için çok teşekkür ederiz, inanın program yayına girdikten sonra olsuul-olumumz eleştiriler okumak bu işin en tatmin edici boyutu. Hep bizimle kalmanız dileğiyle Cevaplamak için giriş yapın

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के द्वारा: ajaykr ajaykr

आदरणीय मदन मोहन सिंह जी, "मंदिर से ज्‍यादा टायलेट जरूरी हैं।" से ज्यादा उपयुक्त कथन होता कि "हर परिवार के लिए हर घर में टायलेट जरूरी है |" किन्तु हमारे देश में यह चलन हो गया है कि नेता-अफसर,मंत्री-जैसे कथ्य-खिलाड़ियों को यदि कोई बात कहनी होती है तो वे हिन्दुओं के मंदिर, उनके पवित्र ग्रन्थ, पूज्य चरित्रादर्श आदि की अपमानजनक तुलना के साथ बेहिचक अपनी बात कह जाते हैं | ऐसा होना नहीं चाहिए | मंदिर-ईश्वर आदि में आस्था न रखना कतई बुरा नहीं है, किन्तु आस्थावानों की भावनाएँ आहत करना निश्चित ही बुरा है | आदरणीय सिंह साहब, आप ने विवादित तथ्य को स्पष्टीकरण के साथ उठाया, आप को हार्दिक सद्भावनाएँ ! किन्तु अंतत: जयराम रमेश को घुमा-फिराकर भाषागत समर्थन देकर ( हिन्दू भावनाओं के प्रति आदरार्थक भाषा का सुझाव न देकर ) देश की अनाथ हिन्दू भावना को और अधिक अनाथ करने के क्रम में एक मुहर और लगा दी |

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

इस ब्लाग को पुरस्कृत करने के पीछे निर्णायक मंडल की कुंठा व सोच की छाप काफी साफ नजर आ रही है। एक ब्लागर की सोच तक तो यह छम्य है, परंतु जब आप जागरण के बैनर तले बैठकर, एक संस्था के तौर पर उसे पुरस्कृत करते हैं तो आपकी जिम्मेदारी अधिक हो जाती है। अधिक गंभीर आसनो पर पहुंचने के बाद व्यक्ति को और अधिक धैर्य व शुचिता से काम लेना पड़ता है। पत्रकारिता को राजनैतिक मिशन के तौर पर उपयोग करना कुंठा का प्रतीक है। यह ठीक है कि पत्रकारिता उद्देश्य प्रधान भी हो सकती है। परंतु इसका उद्देश्य किसी राजनैतिक दल के लिये एजेंट के तौर पर काम करना तो हरगिज नहीं हो सकता। खासतौर पर तब तो हरगिज नहीं जब यह राजनैतिक एजेंडा जातीवाद की मानसिकता से ग्रसित हो।

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के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

ये समाजवाद बड़ी टेढी खीर है। मुझ जैसे आम आदमी के बस की बात नहीं है।....युग बदल गया है। बदले युग के साथ समाजवाद की परिभाषा तो बदलनी होगी। रोटी, कपड़ा और मकान को समाजवाद से हटाना होगा, परिवारवाद की स्‍वीकार्यता को शामिल करना होगा। मैं जहां रहता हूं, वहां आचार्य नरेंद्र देव, मधु लिमये और जनेश्‍वर जैसे समाजवादी भी रहते हैं। उनको बताना होगा कि सियासत में हमने अपना कोई वारिस न लाकर कितनी बड़ी गलती की है। हां, जब भी आऊंगा, सवाल तो करुंगा ही करुंगा। इसलिए जवाब के लिए तुम खुद को तैयार रखना। यह विडंबना ही है कि हम सभी एक विकृत समाजवाद को ढो रहे हैं। बहुत उम्‍दा लेख है। अच्‍छे विश्‍लेषण के साथ। बहुत बहुत बधाई।

के द्वारा: krishnakant krishnakant

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समाजवाद , भारत मे समाजवाद , का ह समाजवाद , समाजवाद खाति लोहिया जी भा उनुका संगे के लोग का का कईल आ आजु के घरी मे समाजवाद के जवन चेहरा लउकत बा तवन । माने एह के " मदन भाई पत्रकार " ना कहि के " मदन भाई पी एच डी" कहि दिहल जाउ त कम ना कहाई । हम जानत बानी आ राउर स्टेट्स ( फेसबुक प ) कई हाली पढे के मिलेला एह से बुझात बा की " समाजवाद " के कगरी से रउवा देखले बानी आ काहे ना , जेकर घर जनेसर मिसिर आ जयप्रकाश नारायण के जरी होखे ओकरा त कम से कम समाजवाद का नीमन से मालुम होखबे करी । भईया सांच के आंच ना , सांचो समाजवाद जवन एह घरी लउकत बा उ समाजवाद ना उ तानाशाही , परिवारवाद , अवसरवाद बा आ एह समाजवाद के आत्मा तानाशाही गुन ह अउरी कुछ ना । लोग पढो आ एह बात के बुझो अब एह ले नीमन तरिका से धुरकुस उडत समाजवाद के केहु ना देखा सकेला । बाकि त कहे वाला कुछउ कहत रहो ।

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तुम कब आए। खबर ही नहीं हुई। हां, कैलेंडर का पहला पन्‍ना जरूर बता रहा है कि तुम आ गए हो। लेकिन कैसे करुं यकीन। कैसे करुं तुम्‍हारा स्‍वागत। पहले तो तुम ऐसे नहीं आया करते थे, बिल्‍कुल दबे पांव और खामोशी ओढे़। पहले जब तुम आते थे, दसों दिशाएं गवाही दिया करती थीं। फूले नहीं समाती थी प्रकृति। हर तरफ सजा दिया करती थी वंदनवार। बहार ही बहार। हवाओं में होती थी सोलहवें साल सी एक लहर। हंसने लगते थे खेत। धरती ओढ़ लिया करती थी हरे, पीले, लाल, सिंदूरी और न जाने कितने रंगों का परिधान। किसी के‍सरिया बालम की सतरंगी पगड़ी की तरह। हर फूल के होठों पर होता था तुम्‍हारा नाम। धूप कुछ चटख, कुछ ज्‍यादा पीली हो जाया करती थी। नाच उठती थीं फिजाएं और घुल जाता था अजब का खुमार। मधुर-मदिर रस बरसाने लगती थी फूलों से सजी महुआ की डारियां। सांसों में उतर जाती थी सरसों की सुगंध। आम के तंबई कोपलों से झांकतीं नन्‍हीं बौरों पर गुनगुनाने लगते थे भ्रमर दल। रंग बिखेरने के लिए जवान होने लगते थे टेसू के फूल। तुम्‍हारे आने पर मंदिरों-चौबारों में उड़ता था, माथे पर सजता था गुलाल। मूर्त रूप ले लेती थीं वीणा वादिनी। पूजी जाती थीं पुस्‍तकें और लेखनी–या कुंदेंदु तुषार हार धवला। कुलांचे भरने लगता था मन में फागुनी एहसास। भौजाइयों के साथ ठिठोली का आगाज। सज जाती थी बैठकी, गोल-दुगोल। गूंजने लगती थी स्‍वर लहरियां–इत से निकलीं नवल राधिका, उतर से कुंवर कन्‍हाई। खेलत फाग परस्‍पर हिलि-मिलि। शोभा बरनी न जाई। इस बार जब तुम आए हो मैं हूं कंकरीट के जंगल से घिरा हूं। कहीं नजर नहीं आता धरा का सतरंगा आंचल। न महुआ है, ना सरसों और ना आम की बिहंसती डालियां। नजर नहीं आते गेहूं के खेत और न लहराती नवजात बालियां। न वो लोग हैं, जो परस्‍पर हिलि-मिलि गाते थे तुम्‍हारा यशगान। अगर कुछ है तो सिर्फ शोर और शोर। कर्कश शोर। मशीनों के बीच भागता आदमी भी बन गया है मशीन और उन्हीं में शामिल मैं भी। इस भागमभाग में कल कैलेंडर की तारीख भी बदल जाएगी। तुम्‍हारें आने का एहसास भी धूमिल हो जाएगा। जैसे एक कालखंड के बाद नई परंपराओं के आगे पुरानी परंपराएं शनै: शनै: धूमिल होने लग जाती हैं। उन्‍हीं धूमिल परंपराओं में झलका है आज धूमिल अतीत। आंखों के सामने घूम गए हैं बाग-बगीचे। गांव-घर, शिवाला। माई के हाथ की बनी हरी मटर की कचौरियां, सिवई और मालपुए। साथ ही इन सबसे बिछड़ने का मलाल। अब तुम्‍ही बताओं कैसे तुम्‍हारा स्‍वागत करूं मलाल के साथ। तुम्‍हीं बताओ वसंत‍, ऋतुराज? हां, एक गुजारिश है तुमसे। तुम तो मेरे गांव भी पहुंचे होगे। वहीं मेरे आने का करना इंतजार। तुम्‍हारा प्रवास तो 40 दिन का होता है न ?

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अग्निपथ एक दृष्टिकोण अग्निपथ में जो गाना दिया गया है पौवा चढ़के आई यह गाना तो मनोरंजन की दृष्टि से सही तो है पर यह गाना समाज की दृष्टि से बड़ा गलत है कैसे गलत है यह में इस ब्लॉग में बता रहा हूँ देखिये यह गाना मुझे भी सही लगा पर मैंने समाज की दृष्टि से सोचा तो मुझे लगा की आजकल लोग वैसे ही पौवा पि रहे है फिर और पिने लग जायेंगे आजकल समाज जो है वह पहले ही शराब पिटे है लेकिन फिर भी यह गाना फ़िल्म के निर्माता ने दिया यह बड़ा गलत लगा कुछ तो में भी नहीं कह रहा हूँ की आजकल के समाज को ऐसे ही गाने अच्छे लगते है लेकिन जो देश के लोग हैं जो अच्छे हैं उनके लिए यह गाना गलत है अब आप देख सकते हैं की इस फिल्म की कितनी कमाईहै लेकिन यह फिल्म बढ़िया भी हैं और समाज की दृष्टि से अहितकर भी है अब जो फ़िल्म है उसमे से यह गाना सर्कार का जो सेंसर बोर्ड है उसे यह गाना हटाना चाहिए और दूसरा जो एक्स्पोसे वाले सीन है जैसे की अपनी पीठ नंगी दिखाना अपनी जो पीठ के पीछे जो चीज है उसे दिखाना इस पर बैन लगाया जाए यह भी सोचे की इससे समाज पर क्या असर होगा मेरा किसी व्यक्ति विशेष को दोष देना मकसद नहीं है

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लोकपाल बिल पर समाजवादी पार्टी और बी एस पी का रुख साफ़ है वोह न तो लोकपाल चाहती है और भ्रस्ताचार को ही ख़तम करना चाहती है, लेकिन बात यह भी है की जो खुद ही भ्रस्ताचार में डूबा है वो क्यों चाहेगा| रही बात कांग्रेस और बी जे पी की तो पार्टी मुखिया तो लोकपाल की वकालत कर रहे हैं पर पार्टी के सांसद की हालत यह है की जैसे उनपर १० कुंतल का पत्थर रख दिया गया है | लोकसभा और राज्य सभा में सांसदों द्वारा किये जा रहे प्रदर्शन का सिर्फ एक ही जवाब है राज्य की जनता सिर्फ अपने क्षेत्र के निर्दल प्रत्यासी को ही विधान सभा और लोक सभा में भेजे पार्टियां अपने आप ही सुधर जाएँगी| मेरा मानना है की या निर्दल को ही वोट, या तो वोट ही न करें| सरफ़राज़ आलम सोनभद्र उत्तरप्रदेश

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के द्वारा: दीपक पाण्डेय दीपक पाण्डेय

क्‍या खूब लिखा है भैया। मैं भी यही सोच रहा था कि बाबा जिस तरह से अब जागे हैं पहले कहां थे। भ्रष्‍टाचार का मुद्दा आज का तो नहीं है। अब तक उनकी नींद क्‍यों नहीं टूटी थी। अन्‍ना हजारे ने एक मुहिम चलाई तो देश उनके साथ उठ खड़ा हुआ। तब बाबा भी साथ आए, लेकिन शायद जनता का इस मुद्दे पर रुझान देखकर पीछे हो लिए और इसे अलग से कैश कराने की योजना में जुट गए। जब एक व्‍यक्ति ने एक मुहिम छेड़ी और उसे जनता का समर्थन मिला तो अलग से कुछ करने की क्‍या जरूरत है। मकसद तो एक ही है भ्रष्‍टाचार को खत्‍म करना। और रही बात बाबा के सत्‍याग्रह की तो इस तरह का समृद्ध आंदोलन कोई भी कर सकता है। बाबा से कोई पूछे कि अगर उन्‍हें देश की और यहां की जनता की इतनी ही परवाह है तो जितना पैसा उन्‍होंने अपने हाईटेक आंदोलन में लगाया है उसे वह बुंदेलखंड या फि‍र उस जैसे किसी पिछड़े ‍क्षेत्र पर लगाते तो उसका कुछ उद्धार हो जाता।

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Jagran Junction Forum ये है हमारे भावी प्रधानमंत्री,एक हमारे वर्तमान प्रधानमंत्रीजी,जिन्हें आंतकवादियो के पकरे जाने पर रात को नींद नहीं आती,दुसरे जो हमारे भावी प्रधानमंत्री है अपने को भारतीय कहने पर शर्म आती है,माननीय इस पुरे भारत वर्ष में आपकी काग्रेस की सरकार है,पुरे देश में आपका राज है,देश पर इतने सिपाही मर मिट जाते है,कितने किसान आत्महत्या कर लेते है,कितने लोग भूख से मर जाते है,क्यों,सिर्फ आपकी सरकार की गलत नीतियों के कारण,देश को आज़ाद हुए इतने वर्ष हो गए,जिसमे शायद कुछ ही वर्ष दूसरी पार्टी की सरकार रही,पर आपकी पार्टी ने देश को कहा से कहा पहुचाया है,आंतकवाद,गरीबी,भुखमरी,भर्ष्टाचार,हमारे देश ये ही सब कुछ मिला है,तब आपको भारतीय कहलाने पर गर्व महसूस होता है,पर शायद हमारा क्या हर हिन्दुस्तानी का सर शर्म से झुक जाता है,साथ ही ऐसे महनुभाव आपके महासचिव जिन्हें अनार्गले बयानबाज़ी के आलावा आपकी पार्टी ने कोई काम ही नहीं दिया,चाहे करकरे की सहादत,ओखला मुठ्बेढ़,ओसामा,या और कोई देश की समस्या उनके लिए देश हीत कोई मायने नहीं रखते,हमारी समझ मैं नहीं आता,देश की जनता ऐसे नेताओ को क्यों सर चडाते है,ऐसे नेताओ को तो वोट ही नहीं देना चाहए,लेकिन हमारे देश की जनता कितनी भोली और नरम दिल है,ऐसे नेताओ को सर चदाती रहती है,और ये नेता चुनाब जितने के बाद जनता के जूते मरते है,कभी सब्दो के और कभी,हमारा सर दुनिया के सामने शर्म से झुक जायेगा पर इनको कभी शर्म न आएगी,

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के द्वारा: Dr S Shankar Singh Dr S Shankar Singh

राहुल गाँधी के इस बयाँन को ज्यादा इम्पोर्तांस देने की कोई जरुरत नहीं है कियोकी वो अभी राजनीती की पढाई कर रहे है और उनके गुरु लोग उनको जो भी सिखाते है वो वही बात बोल देते है. और ऐसे बयांनो के लिए उनको दोष देना निराधार है कियोकी राहुल बाबा शयद ये बात नहीं जानते है कि वो ये लड़ाई किस बात के और किस के लिए तथा किस के हित में लड़ रहे है हलाकि राहुल बाबा को तो एक मोहरा बना कर कोंग्रेस पार्टी ने वहा पर भेज दिया कियोकी अगर हकीकत में राहुल बाबा ऐसी लड़ाई लड़े तो उनको लड़ाई लड़ते लड़ते सात जनम लेने पड़ेगे कियोकी सामने बहिन कु मायावती बैठी है. जी हां ये बहिन जी है जो कभी दलित हुआ करती थी और आज वो दलितों के नाम पर देश और उत्तर प्रदेश कि खुल कर बैंड बजा रही है और देख ने वाली बात तो ये है कि हमारे देश को चलाने कि ठेकेदारी के लिए वोट कि भीख मागने वाले ये हाई प्रोफाइल रेस्पेक्टेद नेता लोग भी इस जरा सी आग में अपने अपने दुकान कि रोटिया सेकने पहुँच गए. मर गया बेचारा गरीब बताओ तो ये बेचारा गरीब किस दुकान पर जाकर अपना दुखड़ा रोये . कियोकी आज के ज़माने में गरीब के आसू पोछने के लिए राजनेताओ ने तरह तरह कि दुकाने खोल राखी है अब ये गरीब तेरी मर्जी पर है कि तू अपने आसू किस दुकान पर पुच्वाना चाहता है.

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राहुल गाँधी को अपने दादी द्वारा बढ़िया बनाये गए एमेरगेनसी के लोगो और दिल्ली के सरदारों के नरसंघरो से शर्मिंदगी तो दूर अफ़सोस भी नहीं हुआ होगा और अज रगे सियार की तरह चोरी से अपराधी टाइप लोगो के लिए ड्रामा करते नेता कम विदूषक अधिक लगे अन्हे शायद यह भी मालूम नहीं होगा कि इन्ही किसानो के भूमि अधिग्रहद कानून के लिए एक नौटंकी अलीगढ के किसानो को प्रधानमंत्री से मिला केर क्र चुके है और यह की अंग्रेजो के समय के कानूनों को इन्ही के बाप-दादे अपने हितो के लिए संशोधित नहीं किये है हा, शर्म हमें यह देख क्र जरुर आता है कि इनके ट्रेनर इन्हें कुछ ज्ञान्वृध्धि कि पुस्तके पठने को नहीं समझाते है जिससे विदेशियो में आम हिन्दुस्तानी कि छवि पर BURA असर पड़ता है कि यही भावी प्रधानमंत्री है जो बुध्धि से हीन है.बढ़िया पोस्ट लिखने के लिए बधाई

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मदन मोहन जी राहुल जी में अभी वह खुबिया नज़र नहीं आ रही है जिनके सहारे वह राजनीत कर के पी ऍम की सीट तक पहुँच सके पर जनता ही है जो उनको नए भारत का निर्माता बनाने पर तुली है देखा नहीं की किस कदर भत्ता पारसोल के किशान उनसे प्रभावित थे? रही वात उनके शर्मिंदगी की शायद आशय कुछ और रहा हो? पर युवाओ में उनका जनून है यदि उनकी चली इस चुनाव में और युवाओ को मौका दिया गया तो नतीजे कुछ अलग ही होंगे, आज जब आप अपने गाव जाते है तो वहा का माहोल देख कर आपको नहीं लगता जैसा देश होना चाहिए वैसा तो कतई नहीं है. अराजकता का माहोल और सभी रिश्ते नाते को तिलांजलि दे रखी है जिसकी लाठी उसकी भैस वाली कहाबत सिद्ध हो रही है तो कौन कहेगा की देश में सब कुछ ठीक ठाक है ?

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क्‍या गांधीजी ने भी सत्‍याग्रह के लिए चंदा मांगा था ? बबुआ नवीन! जीय। मोटा। इसी देश में इंदिराजी जैसी सशक्‍त शासक को जनता ने सत्‍ता से बेदखल कर दिया। कई चुनावों से कांग्रेस उत्‍तर प्रदेश विधानसभा में 50 नहीं पूरा कर पा रही हैं। सिद्धार्थ शंकर रे के बाद पश्चिम बंगाल की स्थिति भी सामने है। बिहार में लालू जी का खटिया-बिछौना गोल हो गया। कहां-कहां गिनाए ? जनता के सामने कोई सशक्‍त विकल्‍प नजर नहीं आ रहा है। लोकतंत्र में जनता जनार्दन सबसे बड़ी न्‍यायाधीश होती है। जन लोकपाल बिल विधेयक के लिए 82 लाख से ज्‍यादा चंदा मिला है अन्‍ना जी और उनके संगठन को। करीब तीस लाख से ज्‍यादा खर्च हो गया है। तो फिर क्‍या इस आंदोलन को प्रायोजित नहीं कहेंगे। गांधीजी से तुलना की जा रही है, क्‍या गांधीजी ने भी सत्‍याग्रह के लिए चंदा मांगा था। जरा इसका डिटेल्‍स पढ़ लीजिए----According to details provided by 'India Against Corruption' (IAC), which spearheaded the campaign, it received a total donation of Rs 82,87,668 while it spent Rs 32,69,900 for the campaign."We have issued receipts to all the donors and have maintained a record of their details. We issued receipts on account of Public Cause Research Foundation which is acting as secretariat for the campaign," an IAC spokesperson said.According to IAC, they spent Rs 9,47,344 for tent, bed, sound system and hall booking for the Jantar Mantar protest and other programmes. An amount of Rs 8,93,938 was spent on telephone calls while another Rs 4,61,382 was spent on travelling.Rs 2,405 was spent on postage while the amount for other expenses were: Printing (Rs 7,32,624), food (Rs 81,751), medical expenses for those on fast (Rs 44,908), video- recording (Rs 11,755) and stationary (Rs 6,940).Jindal Aluminium made the highest donation of Rs 25 lakh followed by an individual Surender Pal Singh (Rs ten lakh), Ramky (Rs five lakh) and Eicher Good Earth Trust and an individual Arun Duggal Rs three lakh each. HDFC Bank gave Rs 50,000 to the movement while Carmel Convent School in Delhi donated Rs 20,000 for the IAC. The Jammu and Kashmir Bank Ltd shelled out Rs 10,000."We received a donation less than Rs 5,000 from2,871 people which amounted to Rs 7,34,498," the spokesperson said.

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अन्ना के बहाने शुरुआत तो हुई | मैं पहले भी कह चुका हूँ कि हम खुद को भी बदलें | संकल्प लें कि- अपनी सुविधा के लिए सुविधा शुल्क देने की आदत को त्याग देंगें | लाइन में लगेगें न कि सुविधा शुल्क देकर अपना काम करायेंगें | अगर ऐसा हो रहा है तो उसका विरोध करेंगें | अपने सही काम को जल्दी और पहले करवाने के लिए सुविधा शुल्क नहीं देंगे | ऐसा करने के लिए दूसरों को भी प्रेरित करेंगे | गलत काम न खुद करवाएंगे और न दूसरों का होने देंगे | हम खुद भी सुविधा शुल्क नहीं लेंगे | इसमें हमें तमाम परेशानियों का जरूर सामना करना पड़ेगा लेकिन अंत सुखद ही होगा | कम से कम खर्च में ही घर चलाना होगा | हो सकता है कि हम समाज की भोतिकतावादी धारा से अलग हो जाएँ | कहावतें हैं कि ईमानदारी की कमाई में ही बरकत होती है , पाप की कमाई मोरी में जाती है | यह सही है कि अकेला चना भाड़ नहीं फ़ोड़ सकता लेकिन यह भी सच है कि एक एक करके ही कारवां बनता है | जिस तरह से अन्ना को समर्थन देने के लिए हम आये उसी तरह से हम यह संकल्प भी ले लें कि न तो भ्रष्टाचार करेंगे और न ही उसका साथ देंगे |

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भईया गोड लागत बानी ! शंका आशंका त होईबे करी आ एह के होखला से केहु ना रोक सकेला ! मिडिया जे अगर ना होईत त फेरु का होईत ? क्या जंतर मंतर पे 10 लाख जुटे थे ? ( 121 करोड आबादी वाले भारत की बात हम कर रहे है ) क्या जंतर मंतर पे 1 लाख लोग जुटे थे ( 3 करोड से उपर फेसबुक पे भारत की आबादी है ) क्या जंतर मंतर पे 50 हजार लोग जुटे थे ( दिल्ली और एन सी आर की आबादी तो आपको मालुम ही होगी) अगर नही तो फिर क्या था ? सरकार को झुकना ही था क्योकि सरकार मे भ्रष्टता सीमा से काफी आगे चला गया है आगे चुनाव आने वाले है तो एक झुनझुना बजाना था ! लोगो का रियेक्सन , भईया लाली लिपिस्टिक लगा के इंडिया गेट और गेटवे आफ इंडिया घुमने से नही होगा , क्रांति खुन से होती है खुन बहाना पडता है इस लिये यह क्रांति तो कम से कम नही थी ! कुछ लोग गाँधी जी से तुलना करते है तो हम कहते है की गाँधी जी के समय मे ना तो फेसबुक था और ना ही ऐसी मिडिया फिर भी डांडी यात्रा पे लाखो लोग चल पडे थे , करो या मरो मे कितने मरे और कितनो ने किया इसका आंकडा नही है आज तक ! कुछ नही होने वाला है जंतर मंतर को तकरीर चौक कह देने से हुस्नी मुबारक जैसे भारतीय नेता नही खत्म हो जायेंगे ! मिश्र जैसे पांडु कंट्री मे भी लाखो लोग जमा हो गये और भारत मे ? बिल्कुल सही कहा है आपने , जब तक हम खुद नही बदलेंगे हम खुद अपनी सोच को दुरुस्त नही करेंगे हम खुद नही समझेंगे तब तक कुछ नही हो सकता है । एक दुरुस्त ब्लाग एक दम सटीक बात और हम उम्मीद रखते है की बहुत लोगो को इस से बुरा भी लगेगा लेकिन यह घटना जो जंतर मंतर पे हुई ठीक वैसे ही है जैसे दुध गरम होने के फफाने लगता है और फिर दो बुँद पानी मार दो उसपे तो अपनी वस्तुस्थिति मे आ के बुल बुल करने लगता है ! क्रांति लाईक के बटन दबाने से नही आयेगी और ना ही ग्रुप समुह पेज बनाने और उससे जुडने से आयेगी !

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प्रिय रस्तोगी जी हमारे इस देश को पिछले कई दसकों से लूटने वाले इस देश के ही चंद गद्दारों जो की हर पार्टी और संगठन में छुपे हुए हैं, की तरह अन्ना जी के आन्दोलन को फेक बता कर आप दिवार पर लिखी इबारत को पढ़ कर भी आँख मूँद रहे है , क्या अन्ना जी के समर्थन में देश के लगभग हर शहर और गाँव गाँव से बचे बूढ़े और जवानो का जोश फेक है ? इन बेशर्म नेताओं ने अपनी लूट को छिपाने के लिए लोकपाल बिल को पिछले ४३ साल से दबा कर इस देश की आन बाण शान और आत्मा को दबा कर रखा है,,,,मुझे पूरा यकीं है के अब वह वक्त करीब आ रहा है जब हम को असली अज्ज़दी अन्ना जी और उनके साथियों के सहयोग से जरूर हासिल होगी और इस देश की जनता ले कर रहेगी..............जय हिंद

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मोहन जी आप जिस बुखार की बात कर रहे हैं, ऐसे मरीज़ रोजाना ही मेरे पास आते हैं. क्योंकि इस बिमारी को बढाने में शायद मैं भी कहीं न कहीं ज़िम्मेदार हूँ. मैं बीएसएनएल की इसी सेक्शन में कार्यरत हूँ ,जहाँ से ब्रॉडबैंड के कनेक्शन दिए जाते हैं. इस बिमारी के कुछ फायेदे भी हैं जैसे इसने इतनी जल्दी हज़ारो की तादाद में लेखक पैदा, जितना बरसों में कोई देश पैदा नहीं कर सकता. शायेर और कवि की तो गिनती ही नहीं. लेकिन एक बात ज़रूर है इस फेसबुक की वबा ने रिटायर्ड बूढ़े माँ-बाप को जीने का सहारा दे दिया है. वेलोग अब दुसरे शहरों में या विदेश में बसे अपने इंजिनीअर/डाक्टर बेटे/ बेटियों से फेस टू फेस न सही पर फेसबुक पर बाते तो कर सकतें है. और उनकी औलाद भी बगैर डालर खर्च किये हुए, अपने गाँव में या छोटे शहरों में पड़े हुए,अपनी आँखों में हज़ारों सपने सजाए, माँ-बाप को अपनी बेपनाह मोहब्बत का एहसास तो दिला ही सकते हैं.

के द्वारा: shahpat shahpat

सादर प्रणाम भईया मातारानी के कोटि कोटि नमन  बोले बोले सरसती मईया की जय । वीणावादिनी की जय । जिनगी अईसन अईसन राही देखावेले जेकरा से जनम भईल वोहि से दुर भगावेले कसके ला करेजा कुहुके ला जियरा मुहफोरनी काहे के अईसन राग बजावे ले शायद हर भोजपुरिया के मन मे कुछ अईसने भाव होई जब उ बसंत ऋतु के एह पावन पर्व के नाव सुनत होई त , हम सांचो कहत बानी , अब देखी ना हमही फोन कईले रहनी हा माई चाची चाचाजी जेठु के आशिर्वाद लेबे खातिर त चाची फोन उठवली हा आ बात चीत भईला के बाद पता चलल हा की चाचाजी नुनुवा बाबा किंहा गईल बाडे , ताल ठोकाई । माने की फगुआ आ गईल बा भईया । त भउजी के तुलना रउवा सरसो से कई देले बानी । राउर दिहल शीर्षक पे हमरा भरत शर्मा के गावल एगो गीत इयाद आ गईल हा अरे कहि के गईले आयिब परसो अरे बीत गईले आजु ले बरसो पियर रे भईले ना हमार सरसो अईसन देहिया हो राम पियर भईले ना बहुत नीमन से रउवा माटी के सोन्हाईल खुशबु बिखेर देले बानी एह ब्लाग से आ एकर सोन्हाईल खुशबु सगरे जवार मे फईल रहल बा । बहुत बहुत बहुत धन्यवाद माटी के जरी , अपना गांव , घर , चौखट के कगरी ले अंगुरी धई के पहुंचावे खातिर । जय भोजपुरी जिआ भोजपुरी

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यह तो कुछ भी नहीं, जब हमारे ईमानदारी के पोस्टर इनलोगों के लिए ध्रितराष्ट्र की तरह नयन बंद केर सिर्फ अपने पद के लिए देश को बेचने वालो को बचाने के लिए झूठ बोलने से लेकर हर तरह से इनके पक्छ में सफाई देते और सवोच्च न्यायालय से फटकारे जाते है तो मनमोहन सिंह दया के नहीं घ्रिडा के पात्र नजर आते है, जो अपनी सारी मर्यादा और और ईमानदारी के बाद भी एक भ्रशतम सर्कार के नहीं देशविरोधी दल और ख़ानदान के चौकीदार वह भी दैनिक वेतन भोगी लगते है उन्हें शायद एहसास नहीं कि इस देश के लोगो ने अभी एक स्वाभाविक और इमानदार इनसे विद्युता में कही ज्यादा मशहूर राष्ट्रपति को अवकास लेते और राष्ट्रपति भवन से मात्र दो अटैची ले केर निकलते देखा है, और इन इमानदार महोदय को जो सीधे जनता का प्रतिनिधि न होते हुए मात्र वोटो के लिए राष्ट्रिय सम्पदा पैर सबसे पहला अधिकार मुसलमानों का होने का ऐलान करते और यहाँ हिंदुस्तान में एक इन्ही के बिरादरी के इमानदार अधिकारी को जिन्दा जलना गवारा करते और तेल माफिया को नेस्तनाबूत करने के अभियान चलाते शहीद शहीद होना मंजूर किया और हमारे मनमोहन कि आखो को नीद में मदहोश होते और यूरोप में एक संदिग्ध मुस्लमान आतंकवादी के लिए सारी रत जागते कटाने का वक्तव्य जरी करना सोचते हुए कितनो कि नीद हराम होते और एक वास्तविक बहादुर शख्श के लिए औरविरोध में २०,०००० लाख लोगो का सामूहिक मूक टोकेन हड़ताल केर श्रधान्जली देते पुरे देश ने देखा और उसमे अपने को पाया है क्या मनमोहन इतने गए गुजरे इमानदार है कि त्यागपत्र की पेशकश करते भी नहीं सुना गया इसतरह की सरकार और उनके नुमैन्दो को जैसे दिग्विजय सिंघो को उस पुस्तक का घूम-- घूम कर विमोचन करते सभी देख रहे है,जिसमे २६/११ के हमलो के लिए R.R.S. को JIMMEDAR MANTE HUE DIKHAYA गया है. JISASE RASHTRVIRODHI और GADDARI की KOI BAT HOHI नहीं SAKTI.AISA PRATIT HOTA है कि VOTE के लिए YE LOG अपने MA,BAHNO,BETIO का BHOUTIK RUP SE SOUDA KARNE SE भी PIICH नहीं RAHANE WALE है.AMIN AB देश का BHAGWAN HI MALIK

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मदन जी, श्रीनगर के ताजा हालात को बयाँ करता हुआ एक बेहतरीन लेख आपके लेख की एक लाइन- "जम्‍मू-कश्‍मी‍र के मुख्‍यमंत्री उमर अब्‍दुल्‍ला की बात। वह कहते हैं–मुझे आज तक यह समझ में नहीं आया कि वर्ष 1992 के बाद अब ही भाजपा को लालचौक में 26 जनवरी को झंडा लहराने का ख्याल क्यों आया।" जब भी किसी कोई अच्छा कार्य देर से शुरू किया जाता है तो कोई यह नही कहता की देर से ही सही शुरुवात तो हुयी बल्कि आज प्रत्येक व्यक्ति यही कहता है कि इतने दिनों से सो रहे थे? और वही बात हमे उमर अब्दुल्ला जी से सुनने को मिली आज जरुरत है तो लोगों की सोच को बदलने की और यकीं मानिये जिस दिन हमारी सोच बदल जाएगी उस दिन भारत फिर से सोने के चिड़िया कहलायेगा और यासीन मालिक जैसे लोगों का पता ही नही चलेगा दीपक जैन रायगढ़ (छ.ग.)

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आ: मदनजी, लाल चौक पर जब पाकिस्‍तान का झंडा फहराया जाता है तो तथाकथ‍ित धर्म निरपेक्ष पार्टियां कैसे  चूल्‍हे में मुंह छुपा लेती हैं, यह बात सर्वव‍िद‍ित है। यह बात मान भी ली जाए कि इसके पीछे भाजपा की राजनीतिक मंशा है तो भी यह स्‍वागत योग्‍य है। स्‍वार्थवश ही सही कम से कम राष्‍ट़़वादी सोच तो व‍िकस‍ित हो रही है। तिरंगे के जरिए भ्रष्‍ट खादीधारी और अल्‍पसंख्‍यक वोट की तरफ स्‍वान की तरह जीभ लपलपाने वाले नेताओं के मुंह पर तमाचा लगना ही चाहिए। आखिर अपने ही देश में झंडा फहराने के नाम पर क्‍यों हायतौबा मची है। उमर अब्‍दुल्‍ला की सियासी मजबूरी के आगे मौन रहकर लालचौक पर पाकिस्‍तानी झंडा लहराते देखने वाली कांग्रेस सरकार अपनी कायरता को छुपाने के लिए ही भाजपा की मंशा पर सवाल उठा रही है।

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दोस्त डरने की जरूरत नहीं जो होना है बो होकर ही रहेगा जरा सोचो आपने केंद्रीय वार्ताकार टीम का नाम सुना है जरूर सुना होगा परन्तु सोचा नहीं होगा ये कांग्रेस और केंद्रीय वार्ताकार टीम एक सिक्के के दो पहलु है जो बात कांग्रेस नहीं कह सकती वह इश केंद्रीय वार्ताकार टीम से कहला रही है इस भारत देश का पतन तो कांग्रेस के द्वारा ही होना है कश्मीर जायेगा अरुणाचल भी जायेगा लेह लाधाख भी जायेगा देखते जाओ उत्तर प्रदेश भी पाकिस्तान का अंग हो जायेगा जिश तरह शकुनी(महाभारत का पात्र) ने कौरवों का वंश समाप्त करा दिया था वैसे ही कांग्रेस भी भारत मे रहकर अखंड भारत को खंडित करा देगी किश किश के लिए रोओगे दोस्त देश से बड़ा कोई नहीं होता न आदमी न परिवार न समाज न धर्मं इस धर्म निरपेक्ष राष्ट्र मे सही मायने ये कांग्रेस ही सबसे जादा सम्प्रदैकता फैला रही है कभी सोचा अल्प्य संखाकक का क्या मतलब होता है इश देश मे अल्प संख्यक मे बहुत सारे धर्म है लेकिन कांग्रेस के लिए शिर्फ़ और शिर्फ़ मुस्लिम ही आते है कांग्रेस के हिसाब से देश के बाकि धर्मो के मानने वालो के लिए भारतीय संविधान का कानून है और मुस्लिम समाज के लिए शिर्फ़ और शिर्फ़ माननीय उलेमा के फतिवा इशमे तो सुप्रिमे कोर्ट को भी lachar कर देती है यह कांग्रेस आखिर लाल चोक पर ही तिरंगा की बात पर सारे के सारे तमक जाते है अरे पटना लखनऊ भोपाल की बात तो कोई नहीं करता क्योकि वहा के मुख्या मंत्री ये जिमेदारी उठाते है उम्र अब्दुल्ला क्यों नहीं कहता की बी.जे.पी. को इशकी जरूरत नहीं है मै खुद लाल चोक पर तिरंगा फः रा ओंगा बात ख़तम पर ऐसा नहीं होता वो तो कांग्रेस के तल्ले चाटने दिल्ली आ जाता है और कांग्रेस का क्या फर्ज बनता है उसके आंसू पोछे या गर्व से कहे की तिरंग तुम फहराओ बी.जे.पी को क्यों मौका देते हो पर एइसा हो नहीं दोस्त डरने की जरूरत नहीं है जब बलिदान देने की जरूरत पडे तो तैयार रहना बच्चे याद करेगे

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आज का नेता वही है जो समाज को जोडने की नहीं कर तोडृने की बात करता है। खासकर वोट और समय के हाथों राजनीति के हाशिए पर पहुंचा दिए गए लोग देश और समाज का किसी भी स्‍तर तक अहित करने से गुरेज नही करना चाहते। बस चाहते हैं कि एक विशेष तबके का वोट उन्‍हें मिल जाए। वह चाहे आजम खां हों या दिग्‍गी राजा, सब बस यही चाहते हैं कि वह एक खास वोट बैंक को अपनी जागीर बना लें। इसके लिए चाहे कुछ  भी कहना क्‍यों नहीं पड जाए। दूसरे दिन की कौन कहे दूसरे ही मिनट उन्‍हें माफी क्‍यों न मांगनी पड जाए लेकिन बस एक तबका खुश हो जाए। देश, दुनिया, लोगों की भावनाएं कहीं कोई मायने रखती ऐसे लोगों को। यह बीमारी नहीं लोगों को मानसिक रूप से बीमार बनाने का एक टोटका है जिसे मौका मिलने पर हर नेता अपनाने से नहीं चूकता। चाहे वह वरुण गांधी हों, राहुल गांधी हों या दिग्‍गी राजा। सभी एक जैसे हैं।

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नितीश जी के द्वारा बिहार में हुए विकास की वजह से मैं उन्हें "विकास पुरुष नितीश जी " कहने में तनिक भी संकोच नहीं करूँगा,और अपने करिश्माई नेतृत्व में मिली इस विजयश्री के लिए उन्हें और बिहार की समस्त जनता को हृदय से बधाई देता हूँ. मदन जी द्वारा लालू राज के बिहार का चित्रण बहुत ही जीवंत लगता है. सांप्रदायिक एवं जातिगत सद्भाव को बना कर रखते हुए भी सही समाचार पहुचना ये हमारे "दैनिक जागरण " की एक अलग पहचान है,लेकिन मदन जी जैसे एक वरिष्ठ एवं अनुभवी पत्रकार की कलम से जातिगत शब्दों के वर्णन कही न कहीं इस पहचान को ठेश पहुचाया है. प्रसंग कुछ "जातिगत शब्दों " के बिना होता तो प्रस्तुति और बेहतर प्रतीत होती . धन्यवाद् !!!!

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लालू को बिहार में जनादेश मिला ही कब था? वीपी सिंह के नाम पर वोट मिले, रामसुंदर दास को मुख्यमंत्री बनना था, बन गए लालू। लालू ने सत्ता मिलते ही राजनीति का एेसा अपराधीकरण किया कि जनादेश का कोई मतलब ही नहीं रह गया। मुझे याद है लालू राज में हुए एक आम चुनाव का। मैं दिल्ली से पटना गया था। न्यू साधनापुरी के जिस मकान में मैं ठहरा हुआ था, उसी में बूथ भी बना था। सुबह नौ बजे साधु यादव के साथ युवकों की एक जमात आई। वोट डालने के लिए लाइन में खड़ी महिलाओं तक को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा गया। दरोगा तक को इसलिए तमाचा मारा गया कि लोगों को वोट क्यों डालने दिया जा रहा था। बूथ कब्जा कर वोट डाल दिए गए। मैं अपने टैरेस पर खड़ा होकर यह सब देख रहा था। मैं अपना वोट भी नहीं डाल सका। जब पटना में यह स्थिति थी, तो बाकी बिहार का क्या हाल होगा, अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। कहने का मतलब ये कि लालू के पास इसी तरह का जनादेश था। सियासी पंडित इसे ही माई समीकरण का करिश्मा बताते रहे। केजी राव के समय में जब निष्पक्ष चुनाव हुए तो लालू के जनादेश की पोल खुल गई। लालू को न कभी जनादेश हासिल था, न कभी होगा। बिहार की जनता पहले से जागृत है, उसे जगाने की जरूरत ही नहीं है।

के द्वारा:

प्रिय मदन मोहन जी प्रणाम, भई आप ने सही ही कहा है आज बिहार का समाज जाग गया है उस की निंद्रा टुट गई है। बहुत दुख होता था जब लोग बिहार के नाम पर वहां के निवासियों पर मजाक करते थे। मै तो कहुंगा मैं आज तक जितने भी बिहार के लोगों से मिला हूं या संपर्क में आया हूं वह मेधावी एवं मेहनती है तथा उच्‍च पदों पर आसीन है। यह भारतीयों के मन में एक भ्रम है कि बिहार पिछड़ा प्रदेश है, नहीं वह लोग सो रहे थे और सीयासत दार उन्‍हें सोते ही रहना देना चाहती थी। मैने समाचारों में सुना था की लालू जी केवल लाठी को ही तेल पिलाने की बात करते थे किन्‍तु पिछले पांच सालों में नितिश जी ने कुछ किया तो शायद बिहार जाग गया। अच्‍छे लेख के लिए बधाई। http://deepakjoshi63.jagranjunction.com

के द्वारा: दीपक जोशी DEEPAK JOSHI दीपक जोशी DEEPAK JOSHI

बहुत बढि़या अच्छा लिखा है आपने। सही बात है बिहार में जनता जनार्दन ने राज्‍य के विकास को सर्वोपरी रखा और लालू जी का डब्‍बा गोल कर दिया। लेकिन यहां एक और अहम घटना घटी लोगों ने परिवारवाद को सिरे से खारिज कर दिया। तभी तो न तो कांग्रेस की चली और न ही लालू जी की। एक तरफ उनका बेटा तेजस्‍वी चुनावी अभियान में हिस्‍सा ले रहा था तो दूसरी तरफ मीडियाकर्मियों से मुखाति‍ब होते वक्‍त क्रिकेट में भविष्‍य तलाश रहा था। दरअसल बिहार में विपक्षी अपनी करनी की वजह से हारे। लालू बिहार पर पहले राबड़ी को थोपा ही अब तेजस्वि को लाने के लिए पष्‍टभूमि तैयार कर रहे थे। दूसरी तरफ कांग्रेस वहां के स्‍थानीय चैनलों पर चुनावी प्रचार में बार बार लालू के 15 वर्षों और नीतीश के 5 वर्षों को बिहार के पिछड़ेपन के प्रमुख कारण बता रही थी जबकि वहां की जनता जानती थी कांग्रेस लालू का साथ न दी होती तो लालू बिहार में पैर जमा ही नहीं पाते। लेकिन कांग्रेस 15 सालों तक लालू जी का साथ दिया। शायद इसलिए लालू का तो डब्‍बा गोल हुआ ही अब कांगे्स भी वहां अपना अस्तित्‍व की लड़ाई लड़ रही है। वैसे जब मौका मिले तो अगली बार बाइक से जरूर बिहार जाइगा वह भी बिना जर्किंग के। उसके बाद आपके द्वारा लिखे गए लेख मैं जरूर पढ़ूंगा।

के द्वारा:

सचमुच प्यार हो गया...भोजपुरिया शब्द के इस्तेमाल से और चार चांद लग गईल बा..एकरा खातिर रउवा के साधुवाद..अइ से भी देशज और भोजपुरिया शब्दों के प्रयोग पत्रकारिता में कम होके लागल बा...एक बार फिर..वैसे भी बिहार में नीतीश के काम के प्यार में मतदान मिलल बा..जो भारत के इतिहास में पहली बार अइसन भईल बा..लेकिन अबहु दबंई के खात्मा बिहार में नइखे भईल..20 दिसंबर के मतदान के बाद इ दिखल बक्सर स्टेशन पर समय रहल साझिखे सात बजे..प्लेटफारम पर हजारों की तादाद में बिहार पुलिस के जवान ड्यूटी कर घर लौटे खातिर पहुंचले..जहां बिहार पुलिस के दंबगई देखे के मिलल.जनरल में सफर करर बिहार पुलिस के जवानों के मंजूर ना रहल..स्लीपर त स्लीपर एसी कोच भी ना बाचल..जउन कोच के दरवाजा बंद रहल औकरा के बिपु ने बंदूक से दरवाजा पर मार मार कर खोलवन लोग..यात्री के उपहार के रूप मे माधर..बहिन.. व कई गालियां बरसात के रूप में मिलन..एक सज्जन त..कहन कारे खोलबे की ना..माधर..ओकरा बाद.इमरेजेंसी दरवाजा जबरन खोल कर घुस गईले और अंदर से दरवाजा खोल कर..अपने अन्य साथियों के भी स्लीपर कोच में घुसइले. हमहु इसब दृश्य के फोटो लेवे में देरी न कइनी..एकराबाद नंबर आइल हमनिके गाड़ी बिभूती एक्सप्रेस के नंबर आइल ..पूरे बोगी बिपु के जवानों से पट गईल..हमार सीट पर एक बुजुर्ग पुलिस कमी बैठइले..उन कर जवाब रहल आप लोग चुपचाप सोइये न..आपको हम तो थोड़े ही डिस्टर्ब कर रहे है... बदलाव त भईल बा मदन भाई ..लेकिन अभी दबंगई वाला  सोच बदलन नइखे..तब आशा बा नीतीश जी पर कि विचलिच न होकर..काम करके के मार्ग पर चलते रहिहन.. बिहार दोबारा एगो नया पहचान बनइ...  

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जनार्दन भईया सादर प्रणाम ई काहे गुड नईखे ? अरे ई गुडे नु बा की जवन आदमी अपना दम पे 15 साल राज कईलस ( ध्यान देब अपना दम पे खाली , ना कवनो काम कईलस ना कवनो धाम आ अपना दम पे ) उ अब ई स्थिति मे बा की ओकरा सन्यास लेबे के जरुरत पडे लागल बा , आ अगर काल्हु के समाचार देखी त उ साफ साफ कही देले बा की ओकर पुरा समर्थन नितिश कुमार के रही, विकास खातिर गरीबन के विकास खातिर, बिहार के विकास खातिर , आ एकर माने साफ बा की उनुका बुझा गईल बा की जीते के बात त विकास करे के पडी । जहा तक बात बा सडक के त जबतक ले वोह राज्य के मुखिया के लगे इच्क्षाशक्ति ना रही केहु क्षेत्र के विकास आ बिनास ना कई सकेला । ई लालु के इच्क्षाशक्ति रहे की बिहार के बिनास भईल आ ई नितिश कुमार के इच्क्षाशक्ति बा की बिहार के बिकास हो रहल बा । आजु लोग बनारस से झारखंड रोड से एक दम हडह्डा के जात बा काहे की नितिश कुमार आपन इच्क्षाशक्ति देखवले बाडे ना त पहिले लोग जाये के नाव ना लेत रहल हा । आजु जवन वातावरण बिहार के बनल बा वोह से पुरा बिहारी जनता खुश बिया आ हम एजुगाकहत बानी की खाली 15 साल , बस 15 साल नितिश के सरकार चलावे दी सभे आ ओकरा बाद देखी । केन्द्र सरकार के काम हवे पईसा दिहल आ इहे प्रणाली बा हर राज्य खातिर आ वोह पईसा के राज्य के मुखिया चारा खातिर युज करत बाडे की लोगन खातिर युज करत बाडे ई मुखिया के उपर बा । आ नितिश कुमार के समय मे सब लोग देख लिहल इहा तक की लालु आ राहुल दुनो जाना । ( वोह लोगन के भाषण सुन आ देख लेब ) बिहार मे अभी भी बहुत कुछ करे के बाकी बा जवना खातिर मदन भईया हई लाईन लिखले बाडे ---> हे नीतीशजी कर्पूरी ठाकुर के बाद पहली बार बिहार की जनता ने आपमें माटी से जुडे़ एक मुख्‍यमंत्री की तस्‍वीर देखी है। लालूजी के राज में बदरंग हो चुकी बिहार की तस्‍वीर को आपने पांच साल में डेंट-पेंटकर कामचलाऊ तो बना दिया है। लेकिन इससे ही बात नहीं बनने वाली। जुरूरत है फुल प्‍लास्टिक सर्जरी की। त बस अब नितिश कुमार के करे के बा आ जवन भाव आ बिचार लउकत बा वोह के देख के ई बुझात बा की होई आ होईबे करी होई ना त जाई कहा ...

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@janardansingh--आप एक राजनीतिक व्‍यक्ति की तरह बयान दे रहे हैं। दो बातें होती है-या तो पास या फेल। जो पास हो गया वही सिकंदर है। फेल को किसी भी वजह से जस्टिफाई नहीं किया जा सकता है। रही बात राज्‍य और केंद्र के प्रोजेक्‍ट की तो, घर कैसे चलाना है यह परिवार के मुखिया की जिम्‍मेदारी होती है। इससे परिवार के सदस्‍य बेफिक्र होते हैं। जनता को इस बात से कोई मतलब नहीं कि केंद्र से पैसा कैसे मिलेगा। वह इसी काम के लिए अपना प्रतिनिधि चुनती है। मुख्‍यमंत्री चाहे तो केंद्र को नाको चने चबवा दे। क्‍यों नही लालू जी संसद भवन के सामने भूख हड़ताल पर बैठ गए। पूरा बिहार फूंक-ताप कर देता केंद्र का। यह सब राजनीतिक बहाने हैं। रही बात नीतीश कुमार के सामने चुनौतियों की तो, वह पहले से भी ज्‍यादा बढ़ गई हैं। इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता। मैने अपनी छोटी सी चिट्टी में भी इस बात का उल्‍लेख किया है। ब्‍लाग के आखिर में है, उसे एक बार फिर पढ़ सकते हैं। बहरहाल, अपना कीमती वक्‍त निकालकर मेरा ब्‍लाग पढ़ा इसके लिए शुक्रिया।

के द्वारा: madan mohan singh,jagran madan mohan singh,jagran

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बहुत अच्‍छे, विकसित और खुशहाल बिहार की क्‍या सुंदर कल्‍पना है-------- लेकिन इससे ही बात नहीं बनने वाली। जुरूरत है फुल प्‍लास्टिक सर्जरी की। बिहार से दिल्‍ली और पंजाब जाने वाली ट्रेनों में ठूसमठूस भीड़ कम करने के लिए भी अब कुछ कीजिए। बेहतर इलाज के लिए लोग बिहार से दिल्‍ली-एम्‍स क्‍यों जाएं। पटना, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, भागलपुर और छपरा में ही जेएनयू और डीयू की झलक क्‍यों न मिले। लहरिया सराय, अररिया, सहरसा, आरा और भोजपुर से पटना बाइरोड चलें तो दिल्‍ली-टू चंडीगढ़ और जयपुर लगे। बिहार के शब्‍दकोश से बाहुबली शब्‍द की विदाई हो। पिस्‍टल कमर से निकलकर बक्‍सा में धरा जाए। जनता मुकम्‍मल तरीके से चैन की सांस ले। जय हो। ईश्‍वर आपकी कामना पूरी करें।

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maie bihar aaj tak nahi guhma per yah news paper meie padtey thhey lalji ke raaj meie wohan aman chain shanti nahi this vikas na naam to tha kahin khaali ek sutriy karykarm tha unka aur key kuch saatiyon jaise ram vilas pasvan woh ki kisi prakr b.j.p. na bihar meie entry kare per un chaara khaney walo ko kya patta ki upper wala unke karm dekh raha tha jo janawron ka khaan bhi hazam karsektey hain woh inssan ko kya chhodd deyngey bahut bihar meie antik karyon ka bolwala tha jo pahley hi nitish ji ne toda aur ab bachakhucha bhi nitisiji ne tod dala yeh prem janta per unhoney kar dala vikas bhi kara aur janta ko anitik karyon se honey wale jeevan se chutkara dilvya aur aagey bhi bihar ki janta ko takliffon se chutkara milega ab yeh lalu woh jo aalu ke bagger samosanahi banta tha woh baat khatam ab nitishji bahrvan daal ke badiya samosey khilva saktey hain jaanwaron ko bhi in dana khaney walon se chutkara dilvyengey aur voton ki khatir congress ko bhi patta chal gaya woh har war lalu and party ke anyay ke aagey guhteney taketihi ab janta ne sab ke guhtey tikk wadiye aaj kah rahey hain asia kaisey ho gaya pucho janta hai sab dekh rahi janta hai sab jaanti hai rahul ho soniya sab ek hi chaal chal rahey hain unko kewal raibareilly ke alwa kuch dekha hi nahi ab unhey dikha india meie bihar hai aur bihar meie india iska kitna bada fark unko mila kewal congree hi congress dikhi ab kahan woh gandey haath usko bihar ne haath se haath nahi milaya wahan ki janta ne bataya jo lalu samosey ke aalu hzam karlega jo kerosin oil deyta nahintha aur vote lalten ko knara tha ab sab saamney jsko pyar karna usko kiya nahi ab pyar ka mulay pata chalaab bihar woh bihar nahi aur bihar hoga aur bihar ki chhavi kharab karney wale khud bahar hogey

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सादर प्रणाम है बलिया के टाईगर को ! जिला टाप लिखनी , हुमचल लिखनी , बहुत सही लिखनी आ एक दाम चांप के लिखनी । एक एक बात से हम सहमत बानी आ एक एक चीज से हम सहमत बानी । बस एगो औरि चीज कहब की बलिया के स्थिति भी कवनो खास नईखे भईया । आ अब बलिया ना पुरा पुर्वांचल के बिहार के एह बदलाव से सीख लेबे के जरुरत बा । हमरा इयाद बा माझी के पुल के शिलान्यास कब भईल रहे आ हाँही खा खुलल हा , शायद उद्घाटन भईल नईखे अभी । बिहार के जवन दुर्गति श्रीमान लालुजी और श्रीमति लालु जी कईले बा लोग वोह के शब्दन मे बयाँ कईल मुश्किल बा आ वोह के एगो बानगी रउवा एगो शब्द , एगो लाईन मे साफ लउकत बा आ उ लाईन बिया - बाइक हैंडल छुड़ा कर पटखनी देने की जुगाड़ में जुट गई। सड़क ऐसे उछालने लगी, जैसे हम किसी नन्‍हें बबुआ को हवा में उछालते हैं। बाइक माथभर नीचे जाती तो कभी ऊपर। जैसे कोई गदहा माटी में अभी-अभी लोटियाकर उठा हो। उमेद करत बानी की राउर ई लेख के पुर्वांचल के लोग भी पढी आ बुझी बाकी बिहार अब बदल रहल बा बदल गईल बा आ नितिश बाबु से अब उमेद ना विश्वास बा ओजुगा के जनता के लेकिन एह बीच मे एगो बहुत बड सवाल पुर्वांचल खातिर रही गईल बा की आखिर कब चेती लो पुर्वांचल के लोग ... मुद्दा से बहक के हम पुर्वांचल के भी लिख देले बानी एह खातिर क्षमा प्रार्थी बानी भईया । जय भोजपुरी जिया भोजपुरी  

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ठेकुआ को माटी की सोंधी महक के साथ जोड़कर मदन बाबू आपने यह जता दिया है कि आपकी जड़े कितनी गहरी हैं और आप संवेदना के स्‍तर पर उससे किस कदर जुड़े हैं। यह सौं फीसदी सच है कि बाहर रहने वाले लोग जब कलकता, आसनसोल या वर्दवान जाते थे तो खाने का ऐसा सामान ले जाते थे जो तीन चार दिन काम लायक रह सके इनमें छनुई फुटेहरी, ठेकुआ, सतुआ आदि प्रमुख होता था। आपने सच में बचपन के उन दिनों की याद दिला दी, जब बाबूजी के साथ हम लोग सपरिवार डुमरांव या बक्‍सर होते हुए कलकता जाते थे तो फटेहरी, ठेकुआ, अगरौटा का साथ काफी समय तक मिलता था। जबकि की पूड़ी और पराठा एक दिन में ही जवाब दे देता था। दूसरी सुबह भुजिया और पूड़ी खाने लायक नहीं रहती थी। अथ ठेकुआ कथा का मर्म वहीं समझ सकता है जो उसके साथ रहा हो

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नंदा दीप जलाना होगा| अंध तमस फिर से मंडराया, मेधा पर संकट है छाया| फटी जेब और हाँथ है खाली, बोलो कैसे मने दिवाली ? कोई देव नहीं आएगा, अब खुद ही तुल जाना होगा| नंदा दीप जलाना होगा|| केहरी के गह्वर में गर्जन, अरि-ललकार सुनी कितने जन? भेंड, भेड़िया बनकर आया, जिसका खाया,उसका गाया| मात्स्य-न्याय फिर से प्रचलन में, यह दुश्चक्र मिटाना होगा| नंदा-दीप जलाना होगा| नयनों से भी नहीं दीखता, जो हँसता था आज चीखता| घरियालों के नेत्र ताकते, कई शतक हम रहे झांकते| रक्त हुआ ठंडा या बंजर भूमि, नहीं, गरमाना होगा| नंदा दीप जलाना होगा ||..................................मनोज कुमार सिंह ''मयंक'' आदरणीय मदन जी, आपको और आपके सारे परिवार को ज्योति पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं || वन्देमातरम

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सत्य वचन कहा आपने । सचाई यही थी लेकिन मंत्रमुग्ध मीडिया ने उनका सफर गोरखपुर से मुंबई वीटी तक करा दिया । यह कैसे संभव है कि नेहरू गांधी परिवार का उगता सूर्य 36 घंटे तक रेल के जनरल कंपार्टमेंट में सफर करे और इस देश में भूचाल न आये । . सोनिया गांधी तो सुपर प्रधानमंत्री हैं, राहुल बाबा सुपरडुपर प्रधानमंत्री हैं । राजमाता सोनिया के कहे पर भले एक बार यूपीए सरकार कान में तेल डाल ले पर राहुल बाबा के वचन ब्रह्मवाक्य हैं । उनके मुंह से शब्द निकले नहीं कि पूरा मंत्रीमण्डल उनकी चाकरी में लग जाता है । सिद्धपुरूषों की यही निशानी है । फिलहाल तो राहुल बाबा यूपी के विश्वविद्यालयों से शिक्षा की अर्थी उठाने के लिये कपिल सिब्बल से मिल आये हैं । लिंगदोह कमेटी की सिफारिशें राहुल बाबा से ऊपर थोड़े ही हैं । यूपी के विश्वविद्यालयों में और केन्द्र विश्वविद्यालयों में 45, 50,55 और 60 साल की उम्र के छात्र नेता फिर से नेतागिरी करके शिक्षा छोड़ बाकी सबका उत्थान किया करें इसलिये राहुल बाबा कपिल सिब्बल से मिल आयें हैं । उनका कहा तो सिब्बल के पिता जी भी नहीं काट सकते हैं चाहे यूपी के हर विश्वविद्यालय में शिक्षा की जगह रोज जिंदाबाद, मुर्दाबाद हो, प्रोफेसरों की ऐसी तैसी हो । . मदन मोहन को कृष्ण मोहन का नमस्कार

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राहुल एक अवसरवादी नेता हैं , राहुल गांधी के व्यक्तित्व की विशेषता है नीतिविहीन आतंकवाद-उग्रवाद-साम्प्रदायिकता या पृथकतावाद को अवसरवादी राजनीति का मोहरा बनाकर इस्तेमाल करने की कांग्रेस की परंपरा रही है। उसका खामियाजा आज सारा देश भुगत रहा है। कांग्रेस ने कभी भी उग्रवाद-आतंकवाद -साम्प्रदायिकता या पृथकतावाद के खिलाफ दो टूक रवैय्या नहीं अपनाया है। इन राजनीतिक प्रवृत्तियों के प्रति कांग्रेस का सॉफ्ट रूख देश में सामाजिक विभाजन का काम करता रहा है और इससे इन विभाजनकारी ताकतों को बल मिला है,वैधता मिली है खैर ये तो हुई उनकी बात अब आपकी लेखन शैली की ओर रुख करें तो उसमे कोई खामी निकलना वाजिब ना होगा हमेशा की तरह बेहद उम्दा लेख है ... रही बात १ रूपए की तो .......देश की राजनीती की तरह उन्सुल्झा हुआ ही है इतना सोचने के बाद भी सो मैंने सोचा १ रूपए के लिए कोन इतनी माथा पची करे ......उन्सुल्झा ही रहने दिया जाय ........ कुल मिलाकर सटीक व राहनीय लेख

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आदरणीय मदनमोहन जी, वास्तव में राहुल एक अवसरवादी नेता से कम नहीं हैं, जब महाराष्ट्र में चुनाव होते हैं, तो बिहारियों और उत्तर भारतियों के खिलाफ एम् एन एस के गुंडों ने आतंक मचाया हुआ था और मार मार कर भगा रहे थे, परन्तु राहुल एक शब्द बिहारियों के समर्थन में और एम् एन एस के खिलाफ एक शब्द नहीं बोले, लेकिन बिहार में चुनाव आते ही वो बोलते हैं मुंबई पर सबका अधिकार है. ........ कश्मीर मुद्दे पर वो जवाब नहीं देते वो कहते हैं ये प्रधानमंत्री जी का विषय है परन्तु उमर अब्दुल्ला के साथ गलबहिया करने स्वयं पहुच जाते हैं, रही युवराज होने की बात ये सबसे बड़े लोकतंत्र में सबसे बड़ी राजनितिक पार्टी जो लोकतंत्र की स्थापना का ढकोसला करती है में राजशाही की बातें कैसे क्या लोकतंत्र सिर्फ जनता के लिए है राहुल जैसों के लिए नहीं. अब बात आपके एक रूपये की, तो आप वो २ रुपये न जोडें जो २४ रूपये में शामिल हैं आप ७२ रूपये में वो तीन रूपये जोडें जो ७५ रूपये में से वापस मिले हैं.

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भईया प्रणाम सबसे बडी दिक्कत यही है कि राहुल करता है । और मिडिया को बासी तिरासी खबर को नया कर के छापना पडता है । अब देखिये न , गोरखपुर से वो रात मे 18 / 19 तारीख को ट्रेन मे सफर करता है लेकिन मिडिया को पता चलता है एक हफ्ते बाद और यु पी की खुफिया पुलिस को मिडिया से पता चलता है कि राहुल गाँधी आये भी थे । समोसा को ही देखिये , जब तक लालु आलु और समोसा बिहार चल रहा था तब बच्चा बच्चा जान गया था समोसा को , लेकिन राहुल ने खाया तो ..... खैर होता है । अब आगे देखिये और जरा इस बात को सोचिये । भारत के सारे नेता जगह जगह पे समोसा खा रहे है । भारत के सारे नेता स्लीपर क्लास मे सफर करने लगे । भारत के सारे नेता कलावती जैसो के घरो तक जाने लगे । भारत के सारे नेता आम आदमी तक पहुंचने लगे । तो इस से मनोबल किसका बढेगा ? एक जगह हमने देखा कि एक औरत छईंटी मे माटी लेकर जा रही है और नंगे पैर है और पीछे पीछे राहुल गान्धी प्लासटिक के छईंटी मे आधा माटी भरा और जुता पहन के जा रहे है , तो लोगो ने तीर का निशान लगा के मजे ले ले के राहुल को गरियाया लेकिन विश्वास किजिये गरियाने वाले वो लोग थे जो अपनी जिन्दगी मे कभी मिट्टी नही उठाये होंगे , जो बिना जुता चप्पल के टायलेट भी नही करते होंगे फिर राहुल पे ऐसी बात क्यो ? राहुल तो चान्दी का नही सोने का चम्मच ले के पैदा हुआ लेकिन जो बिना चम्मच के पैदा हुए है वो ऐसे क्यो ? चलिये ये भी चलता है , अरे भाई कोई तो होना चाहिये जिसे फोकट मे सुनाया जाय कहा जाय । वैसे आप भी राहुल के जादु से बच नही पाये और ये ब्लाग लिखना ही पडा है । बस जैसे आप लिखे है वैसे बाकी भी लिखते है और ये सिलसिला चलता रहता है । लिखा काफी अच्छा है । बधाई है !

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सवाल राहुल गाँधी के समोसा खाने का नहीं है, न उसके लोकल ट्रेन में चलने का है. सवाल है की आखिर राहुल गाँधी ऐसा क्यूँ कर रहे हैं? क्या वह लोगों को मुर्ख बना रहे हैं या सच में उनके मन में कुछ अच्छा करने की इच्छा है. राहुल गाँधी अमेठी के संसद है एवं कांग्रेस पार्टी ने उनको युवा कांग्रेस और NSUI का प्रभार दिया है. राहुल गाँधी ने दोनों ही जगह संगठनों में लोकतान्त्रिक प्रक्रिया की स्थापना की है. यदि वह व्यक्ति देश में किसी गरीब के घर चला जाता है तो हमें उसपे आपत्ति नहीं होनी चाहिए, बल्कि हमें खुस होना चाहिए की चंडी की चम्मच लेकर पैदा हुआ व्यक्ति वास्तविकता जानना चाहता है. उनके इरादे मुझे नेक लगते हैं भले ही उनके राजनीतिक विरोधियों को यह पाखंड लगे.

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सर जी जैसे हर फ‍िल्‍म का रीमेक हिट नहीं होता, वैसे ही राजनीति करने के लिए मंच्‍ा पर खडे होकर रोज रोज के भाषण अब बखूबी काम नहीं करते। जनता की वोट रूपी सहानभूति पाने के लिए कुछ तो अलग करना ही पडेगा और फ‍िर राहुल भइया युवराज जो ठहरे। इनका तो अंदाज ही निराला है और गुरु (ज्‍योतिषी) ने कहा होगा बेटा तेरा वक्‍त बदलने वाला है। रही बात राहुल भइया, मिलीबैंड और बिलगेट्स के बिल की तो अपनी अंटी में रुपये छुपा लो और भोली जनता को दिखा दो कि हमने भी बिल दिया, यह गणित हमारे नेताओं का ही इजाद किया हुआ है। दुकानदार को दिए गए 70 रुपये में प्रत्‍येक को करीब 23: 33 रुपये ही देने पडे न कि 24। बाकी पैसे ::::::::: आआहहाहा ढूढते रह जाओगे।

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